तेहरान । ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों ने अब एक ऐसा मोड़ ले लिया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। प्रदर्शनों की आग अब उन इमारतों तक पहुँच गई है जिन्हें इस्लाम (Islam) में सबसे पवित्र माना जाता है। मस्जिदों को फूंका जा रहा है और मदरसों को आग के हवाले किया जा रहा है।
पवित्र स्थलों पर हमले, कई सवाल खड़े
एक मुस्लिम बहुल देश में, जहाँ धर्म के लिए प्राण देने की परंपरा रही है, वहां इस तरह के हमलों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या ये हमलावर वाकई प्रदर्शनकारी हैं, या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय साजिश छिपी है?
सरकार का दावा: विदेशी दुश्मनों और दंगाइयों की साजिश
ईरानी सरकार का नैरेटिव इस मामले में पूरी तरह स्पष्ट है। जैसे ही मस्जिदों के जलने की खबरें आईं, सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई से लेकर राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान (Masood Pegeshikyan) तक ने इसका ठीकरा विदेशी दुश्मनों और दंगाइयों के सिर फोड़ दिया।
खामेनेई का बड़ा दावा: 250 मस्जिदें नष्ट
खामेनेई ने एक चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा कि प्रदर्शनों के दौरान अब तक 250 मस्जिदें नष्ट कर दी गई हैं। सरकार ने इन हमलावरों को दुष्ट और प्रशिक्षित तत्व करार दिया है, जिनका मकसद केवल तबाही मचाना है।
राष्ट्रपति का आरोप: प्रशिक्षित आतंकी शामिल
राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने सरकारी टीवी पर दिए संबोधन में स्पष्ट कहा कि मस्जिदों में आग लगाने वाले लोग देश और विदेश में प्रशिक्षित आतंकी हैं।
मोसाद पर सीधा आरोप
सरकारी मीडिया ने कुछ प्रमुख मस्जिदों की जली हुई तस्वीरें जारी करते हुए सीधे तौर पर इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद (Israeli intelligence agency Mossad) के भाड़े के सैनिकों पर आरोप लगाया है।
मानवाधिकार संगठनों ने उठाए सवाल
लेकिन ईरान के भीतर और बाहर चल रही बहस सरकार के इन दावों से अलग भी है। कई मानवाधिकार संगठन और विश्लेषक इन आंकड़ों और आरोपों को संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं।
‘फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन’ की आशंका
फ्रांस के लोरेन विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री सईद पेयवंडी इतिहास का हवाला देते हुए कहते हैं कि ईरान में पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं जिन्हें फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन कहा जाता है।
1994 मशहद धमाके का हवाला
उन्होंने 1994 में मशहद में एक पवित्र मकबरे पर हुए धमाके का उदाहरण दिया, जिसका आरोप पहले विपक्षी समूहों पर लगाया गया था, लेकिन वर्षों बाद इसके तार सुरक्षा तंत्र से जुड़े पाए गए थे।
अहमदीनेजाद का पुराना वीडियो भी चर्चा में
साल 2021 में पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद का एक वायरल वीडियो भी इन आशंकाओं को बल देता है, जिसमें वे स्वीकार करते हैं कि कई बार सादे कपड़ों में सुरक्षा बल हिंसा भड़काते हैं ताकि प्रदर्शनकारियों पर सख्त कार्रवाई का बहाना मिल सके।
धार्मिक ध्रुवीकरण की रणनीति?
समाजशास्त्रियों का मानना है कि जली हुई मस्जिदों और कुरान के फटे पन्नों को टीवी पर बार-बार दिखाना सरकार की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है, जिसका उद्देश्य धार्मिक भावनाओं का ध्रुवीकरण करना है।
विरोधियों को ‘इस्लाम विरोधी’ दिखाने की कोशिश
शोधकर्ता हसन यूसुफी एशकौरी के अनुसार, शासन अपने विरोधियों को नास्तिक और कुरान का दुश्मन साबित कर जनता की नजरों में गिराना चाहता है।
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सेंसरशिप के बीच सच्चाई पर पर्दा
फिलहाल, ईरान में इंटरनेट की पाबंदी और कड़ी सेंसरशिप के कारण सच्चाई की स्वतंत्र पुष्टि लगभग असंभव है, लेकिन जलती इमारतों के बीच ईरान का सामाजिक ढांचा बुरी तरह सुलग रहा है।
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