‘कर्ज मांगने में आती है शर्म’ – पीएम शहबाज शरीफ
इस्लामाबाद: प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस्लामाबाद(Pakistan) में कारोबारियों को संबोधित करते हुए स्वीकार किया कि बार-बार विदेशी मदद की गुहार लगाने(To Appeal) से देश का सिर झुक जाता है। उन्होंने कहा कि कर्ज लेना केवल वित्तीय मजबूरी नहीं, बल्कि देश के आत्मसम्मान पर एक बोझ है। जब पाकिस्तान कर्ज मांगता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों (जैसे IMF) और कर्जदाता देशों की कड़ी शर्तें माननी पड़ती हैं, जिससे कई बार देश के हितों से समझौता करना पड़ता है। ‘ना’ कहने की गुंजाइश खत्म होने से पाकिस्तान की नीतिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है।
बदहाली के आंकड़े: 45% आबादी गरीबी की चपेट में
पाकिस्तान(Pakistan) की आंतरिक स्थिति बेहद चिंताजनक(Worrying) हो चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में गरीबी का स्तर साल 2018 के 21.9% से बढ़कर अब करीब 45% तक पहुंच गया है। महंगाई, प्राकृतिक आपदाएं और राजनीतिक अस्थिरता ने 80 लाख से ज्यादा लोगों को बेरोजगार बना दिया है। पाकिस्तान का कुल सरकारी कर्ज मार्च 2025 तक 76,000 अरब रुपये के पार जा चुका है, जो पिछले चार वर्षों में दोगुना हो गया है। रिसर्च और डेवलपमेंट की कमी ने देश के निर्यात को केवल कपड़ा उद्योग तक सीमित कर दिया है।
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‘दोस्त’ देशों के सहारे टिकी है पाकिस्तान की सांसें
वर्तमान में पाकिस्तान(Pakistan) की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चीन, सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देशों के ‘बेलआउट’ और ‘रोलओवर’ पर निर्भर है। चीन ने जहाँ 60 अरब डॉलर का निवेश (CPEC) किया है, वहीं सऊदी अरब और यूएई ने कर्ज चुकाने की समय-सीमा बढ़ाकर पाकिस्तान को डिफॉल्ट होने से बचाया है। विशेष निवेश सुविधा परिषद (SIFC) के जरिए अब पाकिस्तान इन देशों से कृषि, खनन और आईटी क्षेत्र में बड़े निवेश की उम्मीद कर रहा है, ताकि कर्ज के जाल से बाहर निकलने का कोई वैकल्पिक रास्ता मिल सके।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए ‘कर्ज रोलओवर’ का क्या मतलब है?
‘कर्ज रोलओवर’ का मतलब है कि जब पाकिस्तान को किसी देश का पुराना कर्ज चुकाना होता है, तो वह देश अपनी राशि वापस मांगने के बजाय उसे और समय के लिए ऋण के रूप में छोड़ देता है। इससे पाकिस्तान(Pakistan) को तुरंत भुगतान नहीं करना पड़ता और उसके विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम हो जाता है।
पाकिस्तान में गरीबी इतनी तेजी से बढ़ने का मुख्य कारण क्या है?
इसके पीछे कई कारण हैं, जिनमें आसमान छूती महंगाई (Inflation), विदेशी मुद्रा की कमी के कारण आयात पर प्रतिबंध, बार-बार आने वाली विनाशकारी बाढ़ और औद्योगिक उत्पादकता में कमी शामिल है। साथ ही, भारी विदेशी कर्ज पर ब्याज चुकाने में ही बजट का बड़ा हिस्सा चला जाता है, जिससे जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए पैसा नहीं बचता।
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