वॉशिंगटन। अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार बढ़ती तेल कीमतों और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका ने बड़ा फैसला लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के नेतृत्व वाली सरकार ने समुद्र में फंसे रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को अस्थायी रूप से हटाने की घोषणा की है। माना जा रहा है कि इस कदम का उद्देश्य वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ाना और 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी कीमतों को नियंत्रित करना है।
11 अप्रैल तक मिलेगी अस्थायी छूट
अमेरिकी वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) द्वारा जारी जनरल लाइसेंस के तहत यह राहत 11 अप्रैल 2026 तक प्रभावी रहेगी। यह अनुमति केवल उसी रूसी तेल के लिए दी गई है जो 12 मार्च की मध्यरात्रि से पहले जहाजों पर लोड किया जा चुका था और फिलहाल समुद्र में ट्रांजिट में है।
तेल आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेन्ट (Scott Besent) के मुताबिक इस फैसले से वैश्विक बाजार में लाखों बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति तुरंत बढ़ सकती है। इससे ईरान संकट के कारण पैदा हुई तेल की कमी और तेजी से बढ़ती कीमतों पर कुछ हद तक काबू पाने में मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल अल्पकालिक कदम है और इससे रूस को कोई दीर्घकालिक आर्थिक लाभ नहीं होगा।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना चिंता का कारण
इस बीच अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने स्वीकार किया है कि अमेरिकी नौसेना फिलहाल हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल टैंकरों को पूर्ण सुरक्षा देने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में वैकल्पिक आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए रूसी तेल को सीमित छूट देना जरूरी हो गया था।
भारत और चीन को मिल सकती है राहत
अमेरिका के इस फैसले से भारत और चीन जैसे बड़े तेल आयातक देशों को राहत मिलने की उम्मीद है। ये देश अब समुद्र में फंसे रूसी तेल कार्गो को बिना कानूनी बाधाओं के खरीद सकेंगे।
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यूक्रेन युद्ध के बाद लगे थे प्रतिबंध
गौरतलब है कि साल 2022 में रूस‑यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और जी7 देशों ने रूसी तेल पर कड़ा प्राइस कैप और कई प्रतिबंध लगाए थे। हालांकि मौजूदा समय में मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंका ने वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अगर हॉर्मुज मार्ग बाधित होता है तो दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है। फिलहाल यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 11 अप्रैल तक की यह अस्थायी छूट वैश्विक ऊर्जा बाजार को कितनी स्थिरता दे पाती है।
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