मऊ (UP)- न्याय में देर हुई, लेकिन न्याय मिला जरूर! UP बलिया जनपद की गीता सिंह को आखिरकार 18 वर्षों बाद उस पीड़ा और लापरवाही के लिए न्याय मिला, जो उन्होंने मऊ के प्रतिष्ठित फातिमा अस्पताल में प्रसव के दौरान झेली थी। उपभोक्ता फोरम की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जिला और राज्य उपभोक्ता आयोग ने अस्पताल व दो वरिष्ठ महिला चिकित्सकों पर ₹50-50 हजार का हर्जाना देने का आदेश बरकरार रखा।
क्या है मामला ?
टैगोर नगर, बलिया की निवासी गीता सिंह, पत्नी डॉ संजय सिंह, ने वर्ष अगस्त 2006 में मऊ जिले के फातिमा अस्पताल में प्रसव हेतु भर्ती हुई थीं। आरोप है कि अस्पताल की वरिष्ठ महिला डॉक्टर डॉ जूड, डॉ उषा आर्या और प्रबंधन की लापरवाही के चलते प्रसूता की जान जोखिम में पड़ गई थी। अत्यधिक रक्तस्राव और अव्यवस्थित चिकित्सकीय प्रक्रिया ने गीता और उनके नवजात के जीवन को संकट में डाल दिया था।
इस संबंध में गीता सिंह ने 2007 में जिला उपभोक्ता आयोग, मऊ में अस्पताल प्रबंधन और जिम्मेदार डॉक्टरों के विरुद्ध वाद दायर किया। वर्ष 2011 में जिला उपभोक्ता आयोग ने गीता के पक्ष में फैसला देते हुए अस्पताल और दोनों डॉक्टरों पर ₹50-50 हजार का अर्थदंड एक माह के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया था, अन्यथा 9% वार्षिक ब्याज की शर्त भी जोड़ी गई थी।
राज्य आयोग ने भी बरकरार रखा आदेश –
फातिमा अस्पताल पक्ष ने इस आदेश को राज्य उपभोक्ता आयोग में चुनौती दी, लेकिन 25 नवम्बर 2024 को राज्य आयोग ने भी निचली अदालत के निर्णय को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी। इसके बाद गीता सिंह ने पुनः जिला आयोग में आदेश अनुपालन हेतु याचिका दाखिल की। अब अस्पताल की इंश्योरेंस कंपनी ने आदेश के अनुपालन में राशि जमा कर दी है।
वादी के वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज पांडे ने बताया कि यह मामला मेडिकल लापरवाही की स्पष्ट मिसाल है, जहां उचित देखरेख न मिलने के कारण प्रसूता की जान पर बन आई थी।
यह फैसला एक महत्वपूर्ण उदाहरण है कि यदि आम नागरिक धैर्य और कानूनी मार्ग से न्याय की लड़ाई लड़ता है, तो उसे न्याय अवश्य मिलता है – चाहे उसमें वर्षों लग जाएं। यह केस उपभोक्ताओं के अधिकारों और अस्पतालों की जवाबदेही पर गहरा संदेश छोड़ता है।