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Purnia : पिता के बाद जीजा बना दुश्मन, अंधे भाई और बहन से छीना सहारा

Author Icon By Surekha Bhosle
Updated: May 16, 2026 • 4:52 PM
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पूर्णिया के दृष्टिबाधित युवक रितनेश राज ने रिश्तेदारों और नगर निगम कर्मी पर फर्जी दस्तावेज बनाकर उनकी जीविका का एकमात्र सहारा छीनने का आरोप लगाया है. पिता की मौत के बाद अब वह अपनी छोटी दुकान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

पूर्णिया के बाड़ीहाट की तंग गलियों में रहने वाला रितनेश राज अब हर दिन एक ऐसे अंधेरे से लड़ रहा है, जिसे उसने चुना नहीं था. आंखों से देखने में असमर्थ रितनेश की दुनिया पहले ही अंधेरी थी, लेकिन अब अपनों और सिस्टम ने मिलकर उसकी जिंदगी का आखिरी उजाला भी छीनने की कोशिश शुरू कर दी है।

रितनेश के पिता नगर निगम की ओर से मिले एक छोटे से आढ़त में सब्जी बेचकर अपने परिवार का पेट पालते थे. उसी दुकान से घर चलता था, बहनों की शादी हुई और उसी दुकान के सहारे रितनेश (Ritnesh) का जीवन भी किसी तरह गुजर रहा था. पिता बेटे की आंखें थे हर कदम पर सहारा थे।

लेकिन जैसे ही पिता की मौत हुई, रितनेश की जिंदगी बदल गई. जिस बेटे को परिवार का सहारा मिलना चाहिए था, उसी बेटे की बेबसी का फायदा उठाने का आरोप अब उसके अपने रिश्तेदारों और सिस्टम पर लग रहा है. रितनेश का कहना है कि नगर निगम के एक कर्मचारी दीपक मंडल (Deepak Mandal) और उसके बहनोई ने मिलकर फर्जी कागजात तैयार किए और उसके आढ़त पर कब्जा कर लिया. अब उसे बेचने की तैयारी चल रही है।

बहनों ने लिखकर दिया फिर भी मिला धोखा

सबसे दर्दनाक बात यह है कि रितनेश की छह बहनों ने स्टाम्प पेपर पर लिखकर दिया था कि भाई के जीविकोपार्जन के लिए वे दुकान में कोई हिस्सा नहीं लेंगी. बहनों ने भाई का साथ दिया, लेकिन एक बहनोई ने कथित तौर पर लालच में आकर उसी भाई को सड़क पर लाने की साजिश रच दी।

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पूर्णिया रितनेश बताता है कि जिस कागज के आधार पर उसे दुकान से बेदखल किया गया, उसमें उसके पिता का अंगूठा लगाया गया है. जबकि उसके पिता पढ़े-लिखे थे और हमेशा हस्ताक्षर करते थे. बैंक से लेकर दूसरे दस्तावेजों तक में उनके हस्ताक्षर मौजूद हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर यह अंगूठा वाला कागज आया कहां से?

आज जब रितनेश इंसाफ की उम्मीद लेकर नगर निगम पहुंचा, तो वहां भी उसे राहत नहीं मिली. आरोप है कि निगमकर्मी ने आंखों से लाचार रितनेश और पैरों से दिव्यांग उसकी बहन को दुत्कार कर भगा दिया।

एक तरफ अंधा भाई दूसरी तरफ लाचार बहन और सामने बंद दरवाजे. यह दृश्य देखकर हर किसी का दिल पसीज जाए.अब रितनेश के सामने सबसे बड़ा सवाल है, अगर यह दुकान भी चली गई, तो वह जिएगा कैसे?

न नौकरी, न कमाने वाला कोई अपना, न कोई सहारा…उसके पास बस वही छोटी सी दुकान थी, जो अब विवादों में घिर गई है. यह सिर्फ जमीन या दुकान का मामला नहीं है, यह एक ऐसे दिव्यांग बेटे की लड़ाई है जो अपने पिता की आखिरी निशानी और अपने जीने के अधिकार को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

अब देखना होगा कि प्रशासन इस अंधे बेटे की पुकार सुनता है या फिर रितनेश की जिंदगी हमेशा के लिए अंधेरे में डूब जाएगी।

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