नई दिल्ली। अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद पश्चिम एशिया (West Asia) में हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। इस संघर्ष का असर अब वैश्विक स्तर पर दिखने लगा है, जहां ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने के कारण एशिया से लेकर यूरोप तक तेल और गैस की आपूर्ति बाधित हो रही है।
वैश्विक ऊर्जा संकट की आहट
पेट्रोल, डीजल और गैस (Gas) की कमी कई देशों में महसूस की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात जल्द नहीं सुधरे तो यह संकट और गहरा सकता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा।
इस्लामाबाद में वार्ता रही बेनतीजा
इस बीच पश्चिम एशिया में जारी जंग को खत्म कराने के लिए इस्लामाबाद में बातचीत भी हुई, जिसकी मेजबानी पाकिस्तान ने की। हालांकि यह वार्ता किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी।
पाकिस्तान को ‘मैसेंजर’ बनाने की रणनीति
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने दावा किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) अब ईरान पर दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान की मदद लेने की रणनीति अपना रहे हैं। करीब 40 दिनों तक हवाई हमलों के बावजूद ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर पीछे हटने को तैयार नहीं है, ऐसे में पाकिस्तान को संवाद का माध्यम बनाया गया है।
पाकिस्तान का परमाणु अतीत बना सवाल
चेलानी ने यह भी कहा कि पाकिस्तान का परमाणु इतिहास विवादों से घिरा रहा है। 1970 के दशक में ‘इस्लामिक बम’ की अवधारणा सामने आई थी और बाद में देश ने गुप्त रूप से अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।
ए.क्यू. खान नेटवर्क का जिक्र
2000 के दशक की शुरुआत में अब्दुल कदीर खान के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय परमाणु तस्करी नेटवर्क का खुलासा हुआ था, जिसने कई देशों को संवेदनशील तकनीक उपलब्ध कराई। इस घटना के बाद पाकिस्तान को वैश्विक दबाव का सामना करना पड़ा था।
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अमेरिकी रणनीति पर उठे सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे देश को मध्यस्थ बनाना, जिसका परमाणु अतीत विवादित रहा हो, अमेरिकी रणनीति की जटिलताओं और सीमाओं को उजागर करता है। यह कदम न केवल कूटनीतिक चुनौती है, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन और वैश्विक सुरक्षा पर भी असर डाल सकता है।
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