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National- सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी सुनवाई, 9 जजों की बेंच करेगी फैसला

Author Icon By Anuj Kumar
Updated: April 5, 2026 • 12:02 PM
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नई दिल्ली । भारत की न्यायिक व्यवस्था में 7 अप्रैल 2026 का दिन एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आने वाला है। (Supreme Court of India) के मुख्य न्यायाधीश (Surya Kant) की अध्यक्षता में 9 जजों की संविधान पीठ उन जटिल कानूनी सवालों पर सुनवाई शुरू करेगी, जिनका असर कई धार्मिक समुदायों की परंपराओं पर पड़ सकता है।

केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं मामला

यह मामला अब सिर्फ (Sabarimala Temple) में महिलाओं के प्रवेश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह व्यक्तिगत अधिकारों और धार्मिक स्वायत्तता के बीच संतुलन तय करने वाली बड़ी संवैधानिक बहस बन चुका है।

कई धर्मों पर पड़ेगा असर

इस सुनवाई का प्रभाव मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, पारसी महिलाओं के अग्नि मंदिर में अधिकार और दाऊदी बोहरा समुदाय की प्रथाओं पर भी पड़ सकता है। अदालत के सामने यह तय करना बड़ी चुनौती होगी कि क्या व्यक्तिगत मौलिक अधिकार, सामूहिक धार्मिक अधिकारों से ऊपर हो सकते हैं।

2018 के फैसले से शुरू हुई बहस

गौरतलब है कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। हालांकि 2019 में इस मुद्दे को व्यापक प्रभाव को देखते हुए बड़ी बेंच को सौंप दिया गया था।

संविधान की व्याख्या पर फोकस

इस नई पीठ में जस्टिस B. V. Nagarathna सहित कई वरिष्ठ जज शामिल हैं। बेंच मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या करेगी और यह तय करेगी कि धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है।

नैतिकता और न्यायिक अधिकार पर सवाल

अदालत यह भी देखेगी कि धार्मिक मामलों में “नैतिकता” का अर्थ संवैधानिक नैतिकता है या सामाजिक। साथ ही, यह भी तय होगा कि क्या अदालतें किसी प्रथा को धर्म का अनिवार्य हिस्सा घोषित करने का अधिकार रखती हैं।

विभिन्न संगठनों की दखल

इस मामले में All India Muslim Personal Law Board और अन्य संगठनों ने भी हस्तक्षेप किया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जो प्रथाएं महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं, उन्हें धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए।

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परंपरा बनाम अधिकार की बहस

वहीं धार्मिक संस्थाओं का तर्क है कि धर्म की अपनी स्वायत्तता होती है और सदियों पुरानी परंपराओं में न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। 7 अप्रैल से शुरू होने वाली यह सुनवाई तय करेगी कि भारत में संवैधानिक मूल्यों और धार्मिक मान्यताओं के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाएगा।

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