चेन्नई । तमिलनाडु में नई सरकार के गठन के महज एक दिन बाद ही सत्तारूढ़ गठबंधन में मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। मुख्यमंत्री थलपति विजय की पार्टी टीवीके (TVK) को समर्थन दे रही वीसीके के प्रमुख थोल थिरुमावलवन (VCK Chief Thol Thirumavalavan) ने शपथ ग्रहण समारोह की प्रक्रिया और सरकार की शुरुआती टिप्पणियों पर सवाल उठाए हैं। इससे राज्य की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है।
शपथ ग्रहण समारोह पर उठाए सवाल
थिरुमावलवन ने आरोप लगाया कि शपथ ग्रहण समारोह में तमिलनाडु (Tamilnadu) की स्थापित परंपराओं का पालन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि आमतौर पर सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत तमिल थाई वलथु यानी राज्य गीत से होती है, लेकिन इस समारोह में सबसे पहले वंदे मातरम बजाया गया, उसके बाद राष्ट्रगान और अंत में तमिल थाई वलथु प्रस्तुत किया गया।उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह बदलाव राज्यपाल को खुश करने के उद्देश्य से किया गया था। वीसीके प्रमुख ने इसे तमिल अस्मिता के खिलाफ बताते हुए कहा कि वंदे मातरम को प्राथमिकता देना कई लोगों की भावनाओं को आहत कर सकता है।
कर्ज के मुद्दे पर सरकार को घेरा
मुख्यमंत्री विजय ने पद संभालने के बाद पिछली सरकार पर राज्य को भारी कर्ज में डुबोने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि तमिलनाडु पर करीब 10 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है और सरकारी खजाना लगभग खाली हो चुका है।इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए थिरुमावलवन ने कहा कि केवल कर्ज के आंकड़े बताकर जनता में डर पैदा करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि किसी भी राज्य के कर्ज का मूल्यांकन उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में किया जाना चाहिए और फिलहाल तमिलनाडु का कर्ज 15वें वित्त आयोग की निर्धारित सीमा के भीतर है।
सरकार की कुछ घोषणाओं का किया स्वागत
हालांकि वीसीके प्रमुख ने सरकार की कुछ योजनाओं की सराहना भी की। उन्होंने नशामुक्ति अभियान, महिला सुरक्षा और 200 यूनिट मुफ्त बिजली जैसी घोषणाओं का स्वागत किया।इसके साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री विजय से यह स्पष्ट करने की मांग की कि उनकी सरकार पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष विचारधारा पर चलेगी या नहीं। थिरुमावलवन ने कहा कि बदलाव के नारे के साथ सत्ता में आई सरकार को अपनी वैचारिक स्थिति साफ करनी चाहिए, ताकि सहयोगी दलों और जनता के बीच किसी तरह का भ्रम न रहे।
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गठबंधन की स्थिरता पर उठे सवाल
नई सरकार के गठन के तुरंत बाद सामने आए इन मतभेदों ने गठबंधन की स्थिरता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि शुरुआती दौर में ही सहयोगी दलों के बीच असहमति बढ़ती है, तो आने वाले समय में सरकार के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
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