Delhi- केजरीवाल-सिसोदिया समेत 21 को बरी करना अनुचित- दिल्ली हाईकोर्ट

By Anuj Kumar | Updated: March 9, 2026 • 4:46 PM

नई दिल्ली। Delhi High Court ने आबकारी नीति मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री (Arvind Kejriwal) पूर्व उपमुख्यमंत्री (Manish Sisodia) और 21 अन्य आरोपियों को नोटिस जारी किया है। जांच एजेंसी (Central Bureau of Investigation) (सीबीआई) ने अदालत को बताया कि निचली अदालत द्वारा आरोपियों को बरी किया जाना अनुचित आदेश है और इस मामले में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं।

सीबीआई ने फैसले पर उठाए सवाल

सीबीआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने अदालत में कहा कि आबकारी नीति से जुड़ा यह मामला देश के बड़े घोटालों में से एक है और इसमें भ्रष्टाचार के स्पष्ट संकेत हैं। उन्होंने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने Arvind Kejriwal, Manish Sisodia और अन्य आरोपियों को बिना विस्तृत सुनवाई के ही बरी कर दिया। मेहता ने अदालत को बताया कि जांच एजेंसी के पास शराब नीति में कथित हेरफेर और रिश्वतखोरी से जुड़े ठोस साक्ष्य मौजूद हैं। उनके अनुसार, कई गवाह भी सीबीआई के आरोपों का समर्थन करते हैं, लेकिन निचली अदालत ने इन सबूतों को नजरअंदाज कर दिया।

निचली अदालत ने क्या कहा था

पिछले सप्ताह दिल्ली की एक निचली अदालत ने कहा था कि शराब नीति की जांच के दौरान सीबीआई द्वारा जुटाए गए सबूत नीति को छिपाने, पक्षपात या संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का प्रथम दृष्टया मामला साबित करने में असफल रहे हैं। इसी आधार पर अदालत ने Manish Sisodia सहित अन्य आरोपियों को बरी कर दिया था।

विशेष अदालत ने दिया था विस्तृत आदेश

विशेष न्यायाधीश Jitendra Singh इस मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें Arvind Kejriwal, Manish Sisodia, K. Kavitha और 20 अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया था। अदालत ने अपने 598 पन्नों के आदेश में कहा था कि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि नीति बनाने की प्रक्रिया में किसी तरह का पक्षपात या संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो।

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नीति को लेकर क्या थे आरोप

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि Manish Sisodia ने उत्पाद शुल्क नीति से जुड़ी विसंगतियों का उल्लेख करने वाली रवि धवन समिति की रिपोर्ट को नजरअंदाज किया था। हालांकि अदालत ने अपने आदेश में कहा कि नई नीति पिछली उत्पाद शुल्क व्यवस्था की चुनौतियों को दूर करने के लिए तैयार की गई थी। न्यायालय के अनुसार, नीति निर्माण की प्रक्रिया परामर्श, संवाद और प्रशासनिक सावधानी के साथ संचालित की गई थी तथा इसका उद्देश्य वितरण प्रणाली में सुधार और एकाधिकार की प्रवृत्तियों को समाप्त करना था।

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