नई दिल्ली,। (Supreme Court of India) ने ओबीसी क्रीमी लेयर से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर या नॉन-क्रीमी लेयर में रखने का फैसला केवल आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस निर्धारण में पद की प्रकृति, सामाजिक स्थिति और अन्य मानकों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
सिर्फ इनकम ब्रैकेट से तय नहीं होगा दर्जा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल आय सीमा को आधार बनाकर क्रीमी लेयर का स्टेटस तय करना कानून की कसौटी पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता। अदालत के अनुसार इस प्रक्रिया में यह भी देखा जाना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति के परिवार का सामाजिक और प्रशासनिक स्तर क्या है तथा वे किस तरह के पदों पर कार्यरत हैं।
इंद्रा साहनी केस के बाद लागू हुआ नियम
गौरतलब है कि “क्रीमी लेयर” की अवधारणा (Indra Sawhney vs Union of India case) के बाद सामने आई थी। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को आरक्षण देने को सही ठहराया था, लेकिन आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न तबकों को इससे बाहर रखने का निर्देश दिया था। इसके बाद सरकार ने वर्ष 1993 में क्रीमी लेयर की पहचान के लिए नियम बनाए।
फिलहाल 8 लाख रुपये आय सीमा लागू
वर्तमान नियमों के अनुसार यदि किसी ओबीसी परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है तो उसे आमतौर पर क्रीमी लेयर में माना जाता है और उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। इस आय सीमा को आखिरी बार वर्ष 2017 में 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 8 लाख रुपये किया गया था।
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उच्च पदों पर कार्यरत परिवार भी शामिल
क्रीमी लेयर में उन परिवारों के बच्चे भी शामिल हो सकते हैं जिनके माता-पिता ऊंचे संवैधानिक पदों, वरिष्ठ सरकारी सेवाओं या बड़े व्यवसाय से जुड़े हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का लाभ मुख्य रूप से आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े ओबीसी समुदायों तक पहुंचे।
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