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Viral: दिग्गी राजा और सिंधिया महाराज के बीच बर्फ पिघल रही है?

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Updated: August 8, 2025 • 5:01 PM
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भोपाल की अगस्त की दोपहरी में एक वीडियो जैसे किसी पुराने किस्सागो की जीती-जागती तस्वीर बनकर सामने आया. केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Sindhiya), भीड़ के बीच से रास्ता बनाते हुए, दिग्विजय सिंह का हाथ थामकर उन्हें मंच पर ले जाते दिखाई दिए. मौका था भोपाल में रातीबड़hindi.vaartha.com इलाके में एक स्कूल के उद्घाटन का, लेकिन इसने प्रदेश की सियासत में फुसफुसाहटें फिर से तेज कर दीं- क्या रिश्तों की बर्फ पिघल रही है? लेकिन इस एक क्षण के पीछे सदियों की तलवारबाज़ी, राजसी गर्व और राजनीतिक शतरंज की बिसात बिछी है.

राजघरानों का ‘अनकहा हिसाब’

जिस मिट्टी में यह मेल हुआ, वह इतिहास से भरी है. यह कहानी सिर्फ़ दो नेताओं की नहीं, बल्कि दो राजघरानों की है- राघोगढ़ और ग्वालियर. जिनके रिश्ते 1802 से विरोधाभासों के धागों में उलझे हुए हैं. उस साल ग्वालियर के महाराज दौलतराव सिंधिया ने राघोगढ़ के सातवें राजा जय सिंह को हराया था और राघोगढ़ ग्वालियर रियासत के अधीन आ गया.

तब से एक तरह का ‘अनकहा हिसाब’ चला आ रहा है. विडंबना यह कि दोनों नेता भोपाल में पड़ोसी हैं, लेकिन राजनीति में वक्त-वक्त पर शब्दों के शूल चलाते रहे हैं. इस एक दृश्य के पीछे सदियों की कहानियां, रियासतों की अदावत और सत्ता की अनंत परिक्रमा छिपी है.

तलवारों और समझौतों का सिलसिला

राघोगढ़, जिसे 1677 में लाल सिंह खिंची ने बसाया था. और ग्वालियर, जिसकी सत्ता 18वीं सदी में सिंधियाओं के हाथ में आई. दोनों की ठनक 1780 में महादजी सिंधिया द्वारा राघोगढ़ के राजा बलवंत सिंह और जय सिंह की गिरफ्तारी से शुरू हुई. 1818 तक तलवारों और समझौतों का सिलसिला चलता रहा. अंग्रेजों की मध्यस्थता से अस्थायी सुलह हुई, लेकिन दिलों में कड़वाहट बची रही. 1802 में ग्वालियर के महाराज दौलतराव सिंधिया ने राघोगढ़ को अधीन किया, और तब से यह ‘अनकहा हिसाब’ राजनीति में भी अपनी छाया डालता रहा. 

1993 में जब मुख्यमंत्री की दौड़ में माधवराव सिंधिया पिछड़कर दिग्विजय सिंह से हार गए, तो कई लोगों ने इसे राघोगढ़ का ग्वालियर पर पलटवार मान लिया. यह मलाल माधवराव से उनके पुत्र ज्योतिरादित्य तक पहुंचा. 2018 में इतिहास ने खुद को फिर से दोहराया. सत्ता कांग्रेस के पास आई. सिंधिया दावेदार थे, मगर कुर्सी कमलनाथ को मिली. सवा साल बाद, सिंधिया भाजपा में चले गए और आरोपों-प्रत्यारोपों का नया दौर शुरू हुआ.

गद्दार’ और ‘ओसामा’

कुछ साल पहले चुनावी बयार में राघोगढ़ की रैली में दिग्विजय का बयान गूंजा, “कांग्रेस का फायदा उठाकर भाजपा में चले गए… इतिहास गद्दारों को माफ नहीं करेगा.” सिंधिया ने पलटवार किया, “मैं उस स्तर पर नहीं गिरना चाहता, ये जनता तय करेगी कि गद्दार कौन है.” साथ ही तंज कसा, “जो ओसामा को ‘ओसामा जी’ कहते थे…” 

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