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Allahabad HC : ट्रांसजेंडर और समलैंगिक जोड़े को लिव-इन की मंजूरी

Author Icon By Surekha Bhosle
Updated: February 19, 2026 • 12:16 PM
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मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा कि किसी भी बालिग व्यक्ति को अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी चुनने का पूरा अधिकार है और इस मामले में परिवार या समाज कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में ट्रांसजेंडर (transgender) और एक अन्य व्यक्ति के बीच लिव-इन रिलेशनशिप को संरक्षण प्रदान करते हुए उनके परिजनों या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उनके जीवन में हस्तक्षेप नहीं करने का निर्देश दिया है. साथ ही कोर्ट ने संविधान के तहत जीवन और व्यक्तिगत आजादी के मौलिक अधिकार को सर्वोपरि बताते हुए पुलिस को जरूरत पड़ने पर तत्काल सुरक्षा प्रदान करने का भी आदेश दिया है।

मामला, मुरादाबाद जिले के मझोला थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है. दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं और उन्होंने अपनी मर्जी से लिव-इन रिलेशनशिप (live-in relationship) में रहने का फैसला लिया है. इन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि परिवार से ही उनकी जान-माल को खतरा है. स्थानीय पुलिस से सुरक्षा की मांग की गई लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो उन्हें हाईकोर्ट की शरण में आना पड़ा

‘बालिग को मर्जी से जीवनसाथी चुनने का अधिकार’

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा कि किसी भी बालिग व्यक्ति को अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी चुनने का पूरा अधिकार है और इस मामले में परिवार या समाज कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता. कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ (2018) मामले का हवाला दिया जिसमें समलैंगिक संबंधों को मान्यता देते हुए इंडियन पैनल कोड (आईपीसी) की धारा 377 को खत्म कर दिया था।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे संबंध संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन नहीं करते. साथ ही अकांक्षा बनाम यूपी राज्य (2025) मामले का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने पुष्टि की कि शादी न होने या शादी न कर पाने की स्थिति में भी जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार सुरक्षित बने रहते हैं।

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‘परिवार को जीवन में बाधा डालने का अधिकार नहीं’

कोर्ट ने साफ किया कि एक बार जब कोई बालिग व्यक्ति अपना जीवनसाथी चुन लेता है तो परिवार या किसी अन्य को उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डालने का कोई अधिकार नहीं है. राज्य का कर्तव्य है कि वह हर नागरिक के जीवन जीने की आजादी की रक्षा करे. कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अगर याचिकाकर्ताओं के शांतिपूर्ण जीवन में कोई बाधा आती है तो वे पुलिस कमिश्नर या एसएसपी से संपर्क करें. पुलिस तुरंत सुरक्षा प्रदान करेगी।

अगर दस्तावेजी सबूत न हों तो पुलिस बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट (Bone Ossification Test) या अन्य कानूनी प्रक्रिया अपनाकर संबंधित लोगों की उम्र सत्यापित कर सकती है. हालांकि अगर कोई अपराध दर्ज नहीं है तो पुलिस जबरन कोई कार्रवाई नहीं करेगी।

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