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Haridwar: मनसा देवी हादसा…ज़िम्मेदारी किसकी, क्या है वजह?

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Updated: July 28, 2025 • 11:45 AM
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हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर (Mansa devi Mandir) में 27 जुलाई 2025 को सावन के पहले रविवार को हुई भगदड़ में 6-7 लोगों की मौत और 30-50 से अधिक लोगों के घायल होने की दुखद घटना ने कई सवाल खड़े किए हैं। यह घटना राजस्थान के चामुंडा देवी मंदिर (2008) में हुई भगदड़ की याद दिलाती है, जहां बम विस्फोट की अफवाह के कारण 250 से अधिक लोग मारे गए थे। दोनों घटनाओं में भीड़ प्रबंधन की विफलता और अफवाहों का तेजी से फैलना प्रमुख कारण रहे। आइए, इस घटना के कारणों, जिम्मेदारियों और समीक्षात्मक पहलुओं का विश्लेषण करें

घटना का विवरण

हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर, जो बिल्व पर्वत पर स्थित एक प्रमुख शक्तिपीठ है, में रविवार सुबह करीब 9 बजे भगदड़ मची। मंदिर में सावन के पहले रविवार और कांवड़ यात्रा के बाद रास्ते खुलने से भारी भीड़ उमड़ी थी। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, मंदिर के सीढ़ी मार्ग पर श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने और धक्का-मुक्की के कारण यह हादसा हुआ।

कुछ स्रोतों के अनुसार, बिजली के तार में करंट या शॉर्ट सर्किट की अफवाह ने स्थिति को और बेकाबू कर दिया, जिससे लोग जान बचाने के लिए भागने लगे। हालांकि, गढ़वाल मंडल आयुक्त विनय शंकर पांडे और चश्मदीद अजय जयसवाल ने करंट की अफवाह को खारिज किया, यह कहते हुए कि भीड़ का अचानक बढ़ना और अव्यवस्थित प्रवेश-निकास ही मुख्य कारण था

मृत्यु और घायल: विभिन्न स्रोतों के अनुसार, 6-7 लोगों की मौत हुई, और 25-55 लोग घायल हुए, जिनमें 5 की हालत गंभीर थी। घायलों को एम्स ऋषिकेश, हरमिलाप मिशन अस्पताल, और मेला अस्पताल में भर्ती कराया गया।

प्रशासन की प्रतिक्रिया: घटना के तुरंत बाद उत्तराखंड पुलिस, एसडीआरएफ, और एनडीआरएफ ने राहत और बचाव कार्य शुरू किए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए और मृतकों के परिजनों को 2 लाख रुपये व घायलों को 50,000 रुपये की सहायता राशि की घोषणा की। मंदिर ट्रस्ट ने भी मृतकों के परिवारों को 5 लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता देने का ऐलान किया।

स्थिति का नियंत्रण: दोपहर 2 बजे तक मंदिर परिसर को खाली करा लिया गया और इसे फिर से श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया

भगदड़ के कारण

  1. अत्यधिक भीड़: सावन का पहला रविवार और कांवड़ यात्रा के बाद रास्ते खुलने से मंदिर में लाखों श्रद्धालु पहुंचे। मंदिर का सीढ़ी मार्ग और संकीर्ण रास्ता इतनी भीड़ को संभालने के लिए अपर्याप्त था।

अफवाह का प्रसार: कुछ स्रोतों के अनुसार, बिजली के खंभे में शॉर्ट सर्किट या करंट की अफवाह ने भगदड़ को बढ़ावा दिया। हालांकि, प्रशासन ने इसे प्राथमिक जांच में खारिज किया।

अपर्याप्त भीड़ प्रबंधन: मंदिर में पर्याप्त पुलिस बल की कमी थी। सावन के व्यस्त दिन के बावजूद भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उचित व्यवस्था नहीं थी

रोपवे की देरी: उड़न खटोला (रोपवे) की कतार में देरी के कारण कई श्रद्धालु सीढ़ी मार्ग की ओर गए, जिससे वहां दबाव बढ़ा

जिम्मेदारी किसकी?
इस घटना में जिम्मेदारी कई स्तरों पर देखी जा सकती है:

  1. प्रशासन की लापरवाही:

मंदिर के संकीर्ण मार्ग और सीढ़ियों पर भीड़ प्रबंधन के लिए कोई विशेष इंतजाम नहीं किए गए थे, जैसे कि लाउडस्पीकर सिस्टम, जिससे अफवाहों को रोका जा सकता था।[

कांवड़ यात्रा के बाद रास्ते खुलने से भीड़ बढ़ने की संभावना थी, लेकिन इसके लिए पहले से योजना नहीं बनाई गई।[

  1. मंदिर ट्रस्ट की भूमिका:
  1. श्रद्धालुओं का व्यवहार:

हालांकि, श्रद्धालुओं को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं, क्योंकि उनकी सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट की थी।

  1. संरचनात्मक कमियां:

सुझाव और भविष्य के लिए उपाय

  1. आधुनिक तकनीक का उपयोग: भीड़ प्रबंधन के लिए ड्रोन, सीसीटीवी, और रीयल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम लागू किए जाएं।
  2. प्रशिक्षित सुरक्षा बल: धार्मिक आयोजनों में प्रशिक्षित पुलिस और आपदा प्रबंधन टीमें तैनात की जाएं।
  3. संचार व्यवस्था: मंदिर परिसर में लाउडस्पीकर और डिजिटल बोर्ड लगाए जाएं ताकि अफवाहों को तुरंत रोका जा सके।
  4. संरचनात्मक सुधार: मंदिर मार्गों का चौड़ीकरण, आपातकालीन निकास, और रोपवे की क्षमता बढ़ाने जैसे कदम उठाए जाएं।
  5. जागरूकता अभियान: श्रद्धालुओं को भीड़ में व्यवहार और आपात स्थिति में शांति बनाए रखने के लिए शिक्षित किया जाए।
  6. तेज जांच और जवाबदेही: घटना की जांच समयबद्ध हो, और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।

मनसा देवी मंदिर में हुई भगदड़ एक दुखद घटना है, जो प्रशासनिक लापरवाही, अपर्याप्त संसाधनों, और भीड़ प्रबंधन की कमी को उजागर करती है। हालांकि, प्रशासन ने त्वरित राहत कार्य शुरू किए, लेकिन इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए दीर्घकालिक उपायों की जरूरत है। जिम्मेदारी केवल प्रशासन की ही नहीं, बल्कि मंदिर ट्रस्ट और सामाजिक जागरूकता की भी है। इस घटना को एक सबक के रूप में लेते हुए, भविष्य में धार्मिक आयोजनों में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।

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