Latest Hindi News : Supreme Court-मां की जाति ही तय करेगी बच्चे की पहचान-सुप्रीम कोर्ट

By Anuj Kumar | Updated: December 9, 2025 • 2:43 PM

नई दिल्ली,। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में नाबालिग बच्ची के हितों को सर्वोपरि मानते हुए उसकी मां की जाति ‘आदि द्रविड़’ के आधार पर अनुसूचित जाति (SC) प्रमाणपत्र जारी करने की मंजूरी दे दी। यह फैसला समाज और कानून दोनों के दृष्टिकोण से दूरगामी प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि यह उस परंपरागत नियम को चुनौती देता है जिसके तहत अब तक बच्चों की जाति पिता की जाति के आधार पर तय होती रही है।

मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी

सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत (Chief Justic Suryakant) और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल थे, ने मद्रास हाईकोर्ट (Madrash High Court) के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पुडुचेरी की बच्ची को एससी प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने कहा कि यदि बच्ची को समय पर जाति प्रमाणपत्र नहीं मिला, तो उसके भविष्य पर गंभीर असर पड़ सकता है।

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‘मां की जाति के आधार पर प्रमाणपत्र क्यों नहीं?’-CJI

सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि “समय के साथ परिस्थितियां बदल रही हैं, तो फिर मां की जाति के आधार पर जाति प्रमाणपत्र क्यों नहीं दिया जा सकता?” अदालत की यह टिप्पणी सामाजिक और कानूनी दोनों स्तरों पर नई बहस को जन्म देती है। यदि यह सिद्धांत व्यापक रूप से स्वीकार होता है, तो अनुसूचित जाति की महिला और उच्च जाति के पुरुष के बच्चे भी मां की जाति के आधार पर एससी प्रमाणपत्र पा सकेंगे, भले वे पिता की उच्च जाति वाले परिवेश में पले-बढ़े हों।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले की पृष्ठभूमि यह है कि पुडुचेरी की एक महिला ने अपने तीन बच्चों—दो बेटियों और एक बेटे—के लिए अपनी जाति ‘आदि द्रविड़’ के आधार पर एससी प्रमाणपत्र का आवेदन दिया। उसने बताया कि उसके माता-पिता और दादा-दादी आदि द्रविड़ समुदाय से आते हैं और शादी के बाद भी पति उसके मायके में ही रहा।

पुराना नियम: पिता की जाति के आधार पर जाति निर्धारण

परंपरागत रूप से, केंद्र सरकार की 1964 और 2002 की अधिसूचनाओं के अनुसार बच्चों की जाति पिता की जाति और निवास स्थान से तय होती रही है। सर्वोच्च अदालत ने भी कई मामलों में इस सिद्धांत को स्वीकार किया है।2003 के ‘पुनित राय बनाम दिनेश चौधरी’ मामले में अदालत ने कहा था कि आरक्षण से जुड़े मामलों में जाति निर्धारण का आधार पिता की जाति ही होगा।

2012 का महत्वपूर्ण मोड़: रमेशभाई नाइका केस

हालांकि 2012 के ‘रमेशभाई दबाई नाइका बनाम गुजरात सरकार’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अंतरजातीय विवाह या आदिवासी और गैर-आदिवासी विवाह में बच्चे की जाति केवल पिता के आधार पर mechanically तय नहीं की जा सकती। यदि बच्चा यह साबित करे कि उसका पालन-पोषण मां के सामाजिक माहौल में हुआ है और उसने उसी जाति से जुड़े सामाजिक भेदभाव झेले हैं, तो उसे उस जाति का माना जा सकता है।

बच्ची हित सर्वोपरि, व्यापक निर्णय बाद में

नवीनतम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बच्ची के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए मां की जाति के आधार पर एससी प्रमाणपत्र जारी करने की अनुमति दी। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि जाति निर्धारण से जुड़े बड़े संवैधानिक सवालों पर अंतिम निर्णय आगे की सुनवाई में लिया जाएगा।

देशभर में नई बहस छिड़ने की संभावना

इस फैसले के बाद देशभर में जाति प्रमाणपत्र, आरक्षण और अंतरजातीय विवाह से जुड़े अधिकारों पर नई बहस शुरू होने की संभावना है। कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में मां की जाति को निर्णायक माना जाने लगा, तो यह सामाजिक न्याय और आरक्षण व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

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