UP| मऊ शहर के छोटे से गांव गरथौली का एक युवा, जिसने महज 20 साल की उम्र में अपनी लेखनी से साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बना ली है। शहर के रहने वाले अरुण चौरसिया (Arun Charasia), जिन्होंने 12वीं के बाद इंजीनियरिंग या सरकारी नौकरी जैसे पारंपरिक रास्तों को छोड़कर साहित्य और पत्रकारिता को चुना, आज अपनी मेहनत और लगन से नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन रहे हैं।
लखनऊ में पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान उन्होंने अपनी पहली किताब लिखी और अब मास्टर्स के पहले साल में दूसरी किताब पूरी कर चुके हैं। उनकी दूसरी किताब, “मैं मणिकर्णिका हूं”, काशी के मणिकर्णिका घाट पर आधारित है, जिसमें काशी से जुड़े रहस्य, पुनर्जन्म, अघोरी और मृत्यु जैसे गहरे विषयों को छुआ गया है। इसके साथ ही, अरुण ने नेट-जेआरएफ का एग्जाम पास कर और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।
इंजीनियरिंग छोड़ पत्रकारिता और साहित्य को अपनाया
अरुण चौरसिया ने 12वीं तक की पढ़ाई मऊ में पूरी की, लेकिन उनका मन इंजीनियरिंग या डॉक्टरी जैसे रास्तों की ओर नहीं गया। उन्होंने पत्रकारिता को चुना और लखनऊ में पढ़ाई शुरू की। सेकेंड ईयर में ही उनकी पहली किताब “प्रेमावली” आ गई। उनकी दूसरी किताब, “मैं मणिकर्णिका हूं”, जिसे पूरा करने में तीन साल लगे, जो काशी के मणिकर्णिका घाट की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। इस किताब में काशी के रहस्य, पुनर्जन्म की कथाएं और मृत्यु से जुड़े सवालों के जवाब समाहित हैं। अरुण का कहना है कि यह किताब उनके लिए सिर्फ एक रचना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है, जिसने उन्हें जीवन और मृत्यु के गहरे अर्थ समझाए। इसे लिखने में बहुत रिसर्च लगी है। ये किताब लोगों को काफी पसंद भी आ रही है।

चुनौतियों से भरा रहा सफर
अरुण का जीवन हमेशा आसान नहीं रहा। लॉकडाउन के मुश्किल दौर में, जब कई लोग हताश हो गए थे, अरुण मऊ की गलियों में साइकिल पर अपने हाथों से बनाया मसाला बेचा करते थे। एक छोटी सी किराने की दुकान चलाने वाले उनके माता-पिता ने उन्हें पढ़ाई के लिए शहर भेजा। आर्थिक तंगी और सामाजिक बाधाओं के बावजूद, अरुण ने हार नहीं मानी। उनकी मेहनत और जुनून ने उन्हें बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता में मास्टर्स की पढ़ाई तक पहुंचाया। इसके साथ ही, उन्होंने नेट-जेआरएफ का एग्जाम पास कर अपनी योग्यता साबित की और इसके साथ ही कई बड़े मीडिया संस्थानों में काम भी किया।
युवाओं को मल्टी टैलेंटेड होना होगा
अरुण का मानना है कि आज का युवा प्रतिभा से भरा हुआ है, बस उसे सही दिशा देने की जरूरत है। उनके अनुसार, पढ़ाई के साथ-साथ स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। चाहे वह लेखन हो, बोलना हो, पेंटिंग हो, वीडियो बनाना हो या कोई और कला, हर युवा को मल्टी टैलेंटेड होना होगा। वो आगे कहते हैं कि आज के युवा को नंबरों की दौड़ में न पड़कर ज्ञान के पीछे भागना चाहिए। हर उस चीज को पढ़ना चाहिए, जो आपको आनंद दे। किताबें, कहानियां, इतिहास, कुछ भी, बस पढ़ते रहिए। उनका यह संदेश आज के युवाओं के लिए एक नई राह दिखाता है, जहां केवल सरकारी नौकरी ही लक्ष्य नहीं, बल्कि समाज और स्वयं का विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सपनों को हकीकत में बदलने की मिसाल
इनकी कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं। एक छोटे से गांव से निकलकर, आर्थिक तंगी और सामाजिक बाधाओं को पार करते हुए, उन्होंने न सिर्फ अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि साहित्य और पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी किताबें और उपलब्धियां इस बात का सुबूत हैं कि अगर मन में जुनून और मेहनत करने का जज्बा हो, तो कोई भी मंजिल असंभव नहीं। अरुण आज न केवल मऊ के लिए, बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए एक प्रेरणा हैं, जो यह सिखाते हैं कि सपने देखने और उन्हें पूरा करने का साहस ही इंसान को आगे ले जाता है।
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