नई दिल्ली,। अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले से ठीक एक दिन पहले भारतीय ध्वज वाला एलपीजी टैंकर (LPG Tanker) ‘पाइन गैस’ संयुक्त अरब अमीरात के रुवैस पोर्ट पर 45 हजार मीट्रिक टन गैस लोड कर रहा था। जहाज के चीफ ऑफिसर सोहन लाल और 27 भारतीय क्रू सदस्य जल्द घर लौटने की उम्मीद में थे, लेकिन युद्ध शुरू होते ही हालात बदल गए।
होर्मुज बंद, तीन हफ्ते तक फंसा टैंकर
जंग छिड़ते ही सामरिक रूप से अहम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuzz) पूरी तरह बंद हो गया। ईरान (Iran) ने समुद्री मार्ग में माइन्स बिछा दिए, जिससे जहाजों की आवाजाही रुक गई और टैंकर करीब तीन हफ्तों तक वहीं फंसा रहा। इस दौरान क्रू ने मिसाइलों और ड्रोनों को बेहद करीब से गुजरते देखा।
खतरनाक लेकिन सुरक्षित वैकल्पिक रास्ता
11 मार्च को भारतीय अधिकारियों ने क्रू को तैयार रहने को कहा, लेकिन हालात सामान्य होने में समय लगा। 23 मार्च को ईरान ने टैंकर को मुख्य मार्ग के बजाय लारक द्वीप के पास एक संकरे और कम इस्तेमाल होने वाले चैनल से निकलने की अनुमति दी। यह रास्ता लंबा और जोखिम भरा था, लेकिन माइन्स से भरे मुख्य मार्ग की तुलना में ज्यादा सुरक्षित था।
आईआरजीसी की निगरानी में सफर
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने इस वैकल्पिक रूट का सुझाव दिया और हर क्रू सदस्य से व्यक्तिगत सहमति ली। सभी 27 भारतीयों ने एकमत होकर इस रास्ते से जाने का फैसला किया। टैंकर ने लारक और क़ेश्म द्वीपों के बीच से सुरक्षित मार्ग तय किया।
भारतीय नौसेना का सुरक्षा कवच
जैसे ही जहाज ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पार किया, भारतीय नौसेना के चार युद्धपोतों ने उसे सुरक्षा घेरे में ले लिया। करीब 20 घंटे तक जहाज को गल्फ ऑफ ओमान से अरब सागर तक एस्कॉर्ट किया गया, जिससे वह सुरक्षित भारतीय जलक्षेत्र तक पहुंच सका।
ऊर्जा आपूर्ति के लिए अहम मिशन
भारत के लिए यह मिशन बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि देश की बड़ी आबादी एलपीजी आपूर्ति पर निर्भर है। टैंकर को पहले मंगलौर जाना था, लेकिन बाद में इसे विशाखापट्टनम और हल्दिया पोर्ट पर गैस उतारने का निर्देश दिया गया।
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अब भी फंसे हैं कई भारतीय जहाज
विदेश मंत्रालय के अनुसार, अभी भी फारस की खाड़ी में 18 भारतीय जहाज और 458 नाविक फंसे हुए हैं। भारत सरकार ईरान के साथ लगातार कूटनीतिक प्रयास कर रही है ताकि बाकी जहाजों को भी सुरक्षित निकाला जा सके।
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