सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने 29 जुलाई 2025 को एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 की धारा-3 के तहत कर्मचारी के घर से कार्यस्थल जाते समय या कार्यस्थल से घर लौटते समय होने वाली दुर्घटनाएं भी “नौकरी के दौरान और उसके कारण” हुई दुर्घटना मानी जाएंगी। यह निर्णय बॉम्बे हाईकोर्ट के दिसंबर 2011 के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसने कर्मचारियों के हित में एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम की है।
क्या है मामला
मामला महाराष्ट्र की एक चीनी मिल में चौकीदार के रूप में कार्यरत एक कर्मचारी से संबंधित है, जो 22 अप्रैल 2003 को सुबह 3 बजे से 11 बजे की शिफ्ट के लिए कार्यस्थल जा रहा था। कार्यस्थल से करीब 5 किलोमीटर पहले एक सड़क दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गई। श्रमिक क्षतिपूर्ति आयुक्त और सिविल न्यायाधीश, उस्मानाबाद ने मृतक के परिवार को 3,26,140 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस आदेश को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह दुर्घटना कार्यस्थल पर नहीं हुई थी।
मुंबई हाईकोर्ट के फैसले को पलटा
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि कर्मचारी का कार्यस्थल तक का सफर नौकरी का हिस्सा है। कोर्ट ने “नॉशनल एक्सटेंशन थ्योरी” का हवाला देते हुए माना कि कार्य से संबंधित यात्रा के दौरान हुई दुर्घटना को नौकरी के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए। इस फैसले से कर्मचारियों को मुआवजे का हक मिलेगा, जिससे उनके परिवारों को आर्थिक सुरक्षा मिलेगी। यह निर्णय श्रमिक अधिकारों को मजबूत करने में मील का पत्थर साबित होगा।
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