हैदराबाद। तेलंगाना के सिंचाई एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री एन. उत्तम कुमार रेड्डी (N. Uttam Kumar Reddy) ने कहा है कि पालमुरु क्षेत्र की ऐतिहासिक पिछड़ेपन और लंबे समय से चली आ रही सूखा समस्या को दूर करने के लिए राज्य सरकार ने यहां की सिंचाई परियोजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता (highest priority) दी है। मंगलवार को सचिवालय में आयोजित समीक्षा बैठक में मंत्री ने अविभाजित महबूबनगर जिले की सिंचाई परियोजनाओं की प्रगति का जायजा लिया। बैठक में मंत्री जूपल्ली कृष्णा राव, वाकिटी श्रीहरि, सिंचाई सचिव ई. श्रीधर और इंजीनियर-इन-चीफ जनरल रमेश बाबू समेत कई विधायक और अधिकारी मौजूद रहे।
जूराला परियोजना की क्षमता बढ़ाने और लंबित कार्यों में तेजी लाने के निर्देश
उत्तम कुमार रेड्डी ने कहा कि पालमुरु क्षेत्र की परियोजनाओं की प्रगति पर सरकार लगातार नजर रख रही है और कार्यान्वयन में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए ठोस प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं को देवदुला, एसएलबीसी और सीतारामा जैसी प्रमुख योजनाओं के समान प्राथमिकता दी जा रही है। मंत्री ने कहा कि कांग्रेस सरकार पूर्ववर्ती बीआरएस शासन के दौरान पालमुरु क्षेत्र के साथ हुई उपेक्षा को दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने आश्वासन दिया कि अगले पखवाड़े के भीतर पालमुरु परियोजनाओं पर एक और विशेष समीक्षा बैठक आयोजित की जाएगी, ताकि प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन कर कार्यों में तेजी लाई जा सके।
भंडारण क्षमता घटकर आठ टीएमसी से नीचे पहुंच गई
जूराला परियोजना का उल्लेख करते हुए मंत्री ने कहा कि जलाशय में अत्यधिक गाद जमने के कारण इसकी भंडारण क्षमता घटकर आठ टीएमसी से नीचे पहुंच गई है। उन्होंने बताया कि जूराला परियोजना को डीआरआईपी (डैम रिहैबिलिटेशन एंड इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट) के तहत सहायता देने के लिए केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय को प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं। उन्होंने कहा कि डीआरआईपी के तहत होने वाले डी-सिल्टेशन कार्यों से बांध की सुरक्षा, जल भंडारण क्षमता और संचालन क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होगा। उत्तम कुमार रेड्डी ने बीआरएस के इस दावे को भी खारिज किया कि पालमुरु-रंगारेड्डी लिफ्ट सिंचाई परियोजना 90 प्रतिशत पूरी हो चुकी है। उन्होंने इसे भ्रामक बताते हुए कहा कि पिछली सरकार के दौरान ऑफ-टेक प्वाइंट को जूराला से श्रीशैलम जलाशय में स्थानांतरित किए जाने से परियोजना को बड़ा नुकसान हुआ।
टेंडर भी प्रभावी साबित नहीं हुए
उन्होंने कहा कि बीआरएस सरकार द्वारा डिस्ट्रीब्यूटर नेटवर्क के लिए जारी किए गए टेंडर भी प्रभावी साबित नहीं हुए, क्योंकि नहर प्रणाली के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी, जिससे परियोजना के क्रियान्वयन में कई बाधाएं उत्पन्न हुईं। बैठक में अधिकारियों को सभी लंबित परियोजनाओं की प्रगति, प्राथमिकता के आधार पर कार्य योजना और समयबद्ध क्रियान्वयन का विस्तृत प्रतिवेदन तैयार करने के निर्देश दिए गए। साथ ही मानसून से पहले लघु सिंचाई टैंकों की डी-सिल्टेशन, नहरों की मरम्मत और जल वितरण व्यवस्था को मजबूत करने के निर्देश भी जारी किए गए।
भारत की प्रमुख सिंचाई परियोजनाएं कौन सी हैं?
देश में कृषि और जल प्रबंधन के लिए कई बड़ी सिंचाई परियोजनाएं संचालित की गई हैं। इनमें भाखड़ा नांगल परियोजना, नागरजुन सागर परियोजना, हीराकुंड बांध और सरदार सरोवर परियोजना जैसी योजनाएं प्रमुख मानी जाती हैं। इन परियोजनाओं का उद्देश्य खेती के लिए पानी उपलब्ध कराना, बिजली उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण करना है। कई राज्यों की कृषि व्यवस्था इन योजनाओं पर निर्भर मानी जाती है।
प्रमुख सिंचाई परियोजनाएं क्या हैं?
खेती के लिए बड़े स्तर पर पानी उपलब्ध कराने वाली योजनाओं को प्रमुख सिंचाई परियोजनाएं कहा जाता है। इनमें बांध, नहर, जलाशय और लिफ्ट सिंचाई प्रणाली शामिल हो सकती हैं। इन परियोजनाओं का उपयोग कृषि उत्पादन बढ़ाने और सूखा प्रभावित क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने के लिए किया जाता है। कई परियोजनाएं बिजली उत्पादन और पेयजल आपूर्ति में भी मदद करती हैं। भारत में नदी घाटी आधारित कई बड़ी सिंचाई योजनाएं लंबे समय से संचालित की जा रही हैं।
प्रधानमंत्री सूक्ष्म सिंचन योजना क्या है?
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत सूक्ष्म सिंचन को बढ़ावा देने के लिए विशेष कार्यक्रम चलाया जाता है। इसका उद्देश्य “हर खेत को पानी” पहुंचाना और पानी की बचत करना है। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर किसानों को सब्सिडी दी जाती है। इससे कम पानी में अधिक उत्पादन प्राप्त करने में मदद मिलती है। योजना का लक्ष्य खेती को अधिक लाभकारी और जल संरक्षण को मजबूत बनाना है।
सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना कौन सी है?
इंदिरा गांधी नहर परियोजना को भारत की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में गिना जाता है। यह परियोजना राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने के लिए विकसित की गई थी। इसके माध्यम से लाखों हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिली है। कृषि विकास, पेयजल आपूर्ति और मरुस्थलीय क्षेत्रों के विकास में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। यह परियोजना देश की प्रमुख जल प्रबंधन योजनाओं में शामिल है।
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