Research Report : किलनी और घुनों के विकास की गुत्थी सुलझी

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किलनी
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जीनोमिक अध्ययन से परजीविता की उत्पत्ति का खुलासा

हैदराबाद। घुन (माइट्स) और किलनी (टिक्स) की रहस्यमयी दुनिया जितनी विविध है, उतनी ही जटिल भी। देखने में ये कीट जैसे प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में ये अरैक्निड वर्ग से संबंधित हैं, जिनके शरीर के दो भाग और आठ पैर होते हैं। घरों में पाए जाने वाले सूक्ष्म धूल घुनों से लेकर पालतू जानवरों और जंगलों में पाए जाने वाले रक्तचूषक किलनी (Blood-sucking ticks) तक, ये जीव पृथ्वी के लगभग हर वातावरण में मौजूद हैं। इनमें से कई प्रजातियां परजीवी होती हैं और खुजली, लंपी स्किन रोग, पौधों पर गॉल्स जैसी बीमारियों का कारण बनती हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर पशुधन और फसलों को भारी नुकसान होता है।

90 विभिन्न अरैक्निड जीनोम का किया गया विश्लेषण

वैज्ञानिक लंबे समय से इनके जीनोम के आधार पर रोग फैलाने की क्षमता का पूर्वानुमान लगाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अरैक्निड्स के जीनोमिक विकास को समझने के प्रयास अब तक सीमित रहे हैं। इसी दिशा में सीएसआईआर–कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केंद्र (CCMB), हैदराबाद के रामानुजन फेलो डॉ. सिद्धार्थ कुलकर्णी के नेतृत्व में किया गया एक नया अध्ययन महत्वपूर्ण साबित हुआ है। इस शोध में आईआईएसईआर तिरुवनंतपुरम के तीन स्नातक छात्रों के सहयोग से 90 विभिन्न अरैक्निड जीनोम का विश्लेषण किया गया, जो अब तक का सबसे बड़ा ऐसा अध्ययन माना जा रहा है। शोधकर्ताओं ने केवल जीनों की संरचना ही नहीं, बल्कि क्रोमोसोम पर जीनों की भौतिक क्रमबद्धता का भी अध्ययन किया।

ताश के पत्तों की गड्डी की तरह समझा जा सकता है

डॉ. कुलकर्णी के अनुसार, ‘इसे ताश के पत्तों की गड्डी की तरह समझा जा सकता है। समय के साथ पत्ते फेंटे जाते हैं, लेकिन यदि दो अलग समूहों में पत्तों का क्रम एक जैसा मिले, तो यह उनके साझा पूर्वज की ओर संकेत करता है।’ इस विश्लेषण से दो प्रमुख निष्कर्ष सामने आए। पहला, घुन और किलनी दो अलग-अलग वंशों से स्वतंत्र रूप से विकसित हुए हैं। ये दो समूह हैं, एकेरिफॉर्मीज़, जिसमें अधिकांश घुन शामिल हैं, और पैरासिटिफॉर्मीज़, जिसमें किलनी और कुछ अन्य घुन आते हैं। यह अध्ययन अरैक्निड्स के बीच विकासात्मक संबंधों की जटिल गुत्थी को सुलझाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

समय रहते संभव होगा नियंत्रण

वैज्ञानिकों का मानना है कि इन संबंधों की बेहतर समझ से संक्रमण के प्रसार का पूर्वानुमान, नए रोगवाहकों की पहचान और समय रहते नियंत्रण संभव होगा। चूंकि घुन और किलनी वन्यजीवों, पशुओं और मनुष्यों के बीच आसानी से फैलते हैं, यह शोध वन हेल्थ रणनीतियों को मजबूत करने में सहायक होगा। जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण इन सूक्ष्म अरैक्निड्स का फैलाव बदल रहा है। ऐसे में इनके विकासात्मक नेटवर्क को समझना मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

किलनी क्या होती है?

जानवरों और कभी‑कभी इंसानों की त्वचा से चिपककर खून चूसने वाला एक छोटा परजीवी कीट पाया जाता है, जिसे किलनी कहा जाता है। यह अधिकतर गाय, भैंस, कुत्ते, बकरी जैसे पशुओं पर लगती है। इसके कारण जानवर कमजोर हो सकते हैं और कई बार गंभीर बीमारियां भी फैलती हैं।

किलनी को इंग्लिश में क्या कहते हैं?

अंग्रेज़ी भाषा में इस परजीवी को “Tick” कहा जाता है। टिक एक बाह्य परजीवी होता है, जो त्वचा पर चिपककर खून चूसता है। पशुपालन और पशु चिकित्सा में टिक एक आम समस्या मानी जाती है, खासकर गर्म और नमी वाले इलाकों में।

किलनी मारने के लिए कौन सी दवा है?

पशुओं पर किलनी खत्म करने के लिए विशेष कीटनाशक और दवाइयां उपयोग में लाई जाती हैं। आमतौर पर इवर्मेक्टिन इंजेक्शन, सायपरमेथ्रिन स्प्रे, फ्लुमेथ्रिन या डेल्टामेथ्रिन युक्त दवाएं प्रयोग की जाती हैं। दवा का सही चयन और उपयोग पशु चिकित्सक की सलाह से करना सुरक्षित और प्रभावी माना जाता है।

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Ajay Kumar Shukla

लेखक परिचय

Ajay Kumar Shukla

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