नई दिल्ली,। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी और सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnav ) ने सोशल मीडिया और इंटरनेट कंपनियों को चेतावनी दी है कि वे अपने प्लेटफॉर्म पर आने वाली सामग्री की जिम्मेदारी लें ताकि बच्चों, महिलाओं और अन्य ऑनलाइन (Online) उपयोगकर्ताओं के लिए इंटरनेट (Internet) को सुरक्षित बनाया जा सके। वैष्णव ने कहा कि इन मंचों को सतर्क होना होगा और यह समझना होगा कि हजारों सालों में मानव समाज ने जिन संस्थाओं में विश्वास बनाया है उसे मजबूत करना कितना जरूरी है।
हानिकारक सामग्री पर सख्ती के संकेत
उन्होंने कहा कि जो सोशल मीडिया मंच अपने उपयोगकर्ताओं को हानिकारक सामग्री से बचाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं अपनाएंगे, उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाएगा। अगर इन सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया तो उन्हें निश्चित रूप से जवाबदेह माना जाएगा क्योंकि अब इंटरनेट की प्रकृति बदल चुकी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज या व्यक्तित्व का उपयोग कर बिना उसकी अनुमति के सिंथेटिक सामग्री तैयार नहीं की जानी चाहिए। उनके अनुसार अब बड़े बदलाव का समय आ गया है और समाज को जिस परिवर्तन की जरूरत है उसमें सभी डिजिटल मंचों को सहयोग करना चाहिए।
आयु-आधारित नियम और डीपफेक पर चर्चा
अश्विनी वैष्णव ने कहा कि अब कई देशों द्वारा यह स्वीकार किया जा चुका है कि आयु-आधारित नियमावली जरूरी है। यह हमारे डीपीडीपी अधिनियम का हिस्सा था, जब युवाओं के लिए उपलब्ध सामग्री में आयु-आधारित अंतर तय किया गया। उन्होंने बताया कि सिर्फ बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की बात ही नहीं, बल्कि सरकार इंटरनेट मध्यस्थों के साथ डीपफेक सामग्री को रोकने के बेहतर समाधान पर भी चर्चा कर रही है।
एक निश्चित उम्र से कम बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध की मांग उस समय तेज हुई जब ऑस्ट्रेलिया इस तरह का प्रतिबंध लागू करने वाला पहला देश बना। आंध्र प्रदेश के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री नारा लोकेश ने भी राज्य में ऐसे नियम लागू करने की संभावना के संकेत दिए, जिसके बाद अन्य राज्यों ने भी इस दिशा में विचार करने की बात कही।
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कंटेंट क्रिएटर्स को मिले राजस्व में हिस्सेदारी
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक वैष्णव ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया और इंटरनेट मंचों को कंटेंट क्रिएटर्स के साथ राजस्व साझा करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पारंपरिक मीडिया, बड़े और छोटे इन्फ्लूएंसर्स, प्रोफेसर, शोधकर्ता और न्यूज चैनल जो अपनी सामग्री इन मंचों पर अपलोड करते हैं, उन्हें उचित लाभ मिलना चाहिए।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अब यह सिद्धांत हर जगह लागू होना चाहिए कि सामग्री बनाने वाले लोगों के साथ राजस्व की उचित हिस्सेदारी साझा की जाए, ताकि डिजिटल इकोसिस्टम संतुलित और न्यायसंगत बन सके।
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