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Supreme Court- सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, जाति नहीं, मेरिट होगी जनरल कैटेगरी का आधार

Anuj Kumar
Anuj Kumar
Supreme Court- सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, जाति नहीं, मेरिट होगी जनरल कैटेगरी का आधार

नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण और चयन प्रक्रिया को लेकर एक ऐसा ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है, जो भविष्य की सभी भर्तियों की दिशा बदल देगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अनारक्षित या सामान्य श्रेणी किसी विशेष वर्ग के लिए आरक्षित कोटा नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से योग्यता यानी मेरिट पर आधारित एक खुला मंच है।

जनरल कैटेगरी पर सुप्रीम कोर्ट की साफ व्याख्या

अदालत के इस फैसले का सीधा संदेश यह है कि यदि आरक्षित वर्ग (Reserve Category) का कोई भी अभ्यर्थी बिना किसी छूट या आयु सीमा में रियायत के सामान्य श्रेणी के कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे अनिवार्य रूप से जनरल कैटेगरी की सीट पर ही चयनित माना जाएगा। यह फैसला न केवल मेधावी छात्रों के हक में है, बल्कि यह संवैधानिक समानता के सिद्धांतों को भी नई मजबूती प्रदान करता है।

जाति नहीं, काबिलियत होगी चयन की कसौटी

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने इस कानूनी स्थिति को साफ करते हुए कहा कि सरकारी नौकरियों में ओपन कैटेगरी का अर्थ ही यही है कि वहां जाति या समुदाय की दीवारें नहीं होंगी। प्रवेश की एकमात्र कसौटी केवल और केवल उम्मीदवार की काबिलियत होगी। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि किसी अभ्यर्थी की आरक्षित पृष्ठभूमि उसे जनरल लिस्ट का हिस्सा बनने से नहीं रोक सकती।

अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन बताया

यदि भर्ती परीक्षाओं के दौरान ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहाँ आरक्षित वर्ग का कट-ऑफ सामान्य श्रेणी (General Category) से भी ऊपर चला जाता है, तो भी योग्य उम्मीदवारों को जनरल कैटेगरी से बाहर रखना अनुच्छेद 14 और 16 के तहत मिले समानता के अधिकारों का सीधा उल्लंघन होगा।

‘दोहरा लाभ’ वाली दलील सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की

अक्सर प्रशासनिक स्तर पर यह तर्क दिया जाता रहा है कि आरक्षित श्रेणी के छात्र का जनरल सीट पर चयन उसे दोहरा लाभ पहुँचाने जैसा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि योग्यता के दम पर हासिल की गई सफलता को अतिरिक्त लाभ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

फॉर्म में जाति लिखना मेरिट से वंचित करने का आधार नहीं

अदालत का मानना है कि यदि मेधावी उम्मीदवारों को उनकी आरक्षित श्रेणियों तक ही सीमित कर दिया गया, तो यह प्रतिभा का अपमान होगा और समान अवसर की मूल भावना को ठेस पहुँचाएगा। फॉर्म भरते समय जाति का उल्लेख करना केवल आरक्षित लाभ का दावा करने का एक जरिया है, यह किसी अभ्यर्थी को उसकी मेरिट के आधार पर मिलने वाली सीट से वंचित करने का हथियार नहीं बन सकता।

राजस्थान भर्ती विवाद से जुड़ा है मामला

यह न्यायिक स्पष्टता राजस्थान में न्यायिक सहायकों और क्लर्कों की भर्ती से जुड़े एक विवाद के बाद सामने आई है। इस मामले में कई आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों ने सामान्य श्रेणी के कट-ऑफ से भी अधिक अंक प्राप्त किए थे, फिर भी उन्हें चयन प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया था।

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भविष्य की भर्तियों पर पड़ेगा दूरगामी असर

राजस्थान हाईकोर्ट के हस्तक्षेप और अब सुप्रीम कोर्ट की अंतिम मुहर के बाद यह तय हो गया है कि योग्यता ही सर्वोपरि रहेगी। इस फैसले के दूरगामी प्रभाव होंगे; जहाँ एक ओर सामान्य श्रेणी में प्रतिस्पर्धा और अधिक तीव्र होगी, वहीं दूसरी ओर वंचित वर्गों के प्रतिभावान युवाओं के लिए सफलता के नए द्वार खुलेंगे

सुप्रीम कोर्ट में कितने ब्राह्मण जज हैं?

सुप्रीम कोर्ट में ब्राह्मण जजों की संख्या अलग-अलग समय पर बदलती रहती है, लेकिन 2025 के अंत तक के आंकड़ों के अनुसार, 33 जजों में से लगभग 12 जजों (लगभग 36%) के ब्राह्मण समुदाय से होने का अनुमान है,

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