शोषण और भेदभाव की शिकायतों में भारी उछाल
मास्को: विदेश मंत्रालय के हालिया आंकड़े बताते हैं कि रूस अब भारतीय छात्रों(Russia) के लिए असुरक्षित होता जा रहा है। साल 2025 में दुनियाभर से आई कुल 350 शिकायतों में से 200 से ज्यादा मामले अकेले रूस से हैं। पिछले तीन वर्षों में यह ग्राफ तेजी से बढ़ा है-जहाँ 2023 में मात्र 68 शिकायतें थीं, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 201 तक पहुंच गई। हाल ही में 7 फरवरी को एक यूनिवर्सिटी हॉस्टल में हुई चाकूबाजी की घटना ने इन चिंताओं(Concerns) को और गहरा कर दिया है, जिसमें चार भारतीय छात्र घायल हुए थे।
नस्लीय भेदभाव और यूनिवर्सिटी प्रशासन का रवैया
रूस(Russia) में पढ़ रहे मेडिकल छात्रों का आरोप है कि उन्हें न केवल अन्य देशों के छात्रों से नस्लीय भेदभाव और गाली-गलौज झेलनी पड़ती है, बल्कि यूनिवर्सिटी(University) प्रशासन भी उनके प्रति सहायक नहीं है। छात्रों का कहना है कि प्रशासन छोटी-छोटी बातों पर कॉलेज से निकालने की धमकी देता है और छठे साल तक पहुंचते-पहुंचते कई छात्रों को पढ़ाई से बाहर कर दिया जाता है, जिससे उन्हें भारी आर्थिक और मानसिक नुकसान होता है। इसके अलावा, कई यूनिवर्सिटीज तय सीमा (200 छात्र) से कहीं अधिक (1,200 छात्र) एडमिशन ले रही हैं, जिससे संसाधनों और सुरक्षा की कमी हो गई है।
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छात्रों का मोहभंग और दूसरे देशों का रुख
रूस-यूक्रेन युद्ध और बढ़ती असुरक्षा के कारण अब भारतीय छात्रों का रूस से मोहभंग हो रहा है। आंकड़ों के अनुसार, रूस(Russia) जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में 50% की गिरावट आई है। अब छात्र रूस के विकल्प के रूप में कजाखस्तान और किर्गिस्तान जैसे देशों को ज्यादा सुरक्षित मान रहे हैं। हालांकि, भारत सरकार ने लोकसभा में स्पष्ट किया है कि दूतावासों में विशेष अधिकारी तैनात किए गए हैं जो छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सीधे यूनिवर्सिटी प्रशासन से बातचीत करते हैं।
रूस में भारतीय छात्रों की संख्या में गिरावट का मुख्य कारण क्या है?
रूस(Russia) में बढ़ते नस्लीय भेदभाव, यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा मानसिक उत्पीड़न, सुरक्षा की कमी और 2022 से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पैदा हुई अनिश्चितता इसके मुख्य कारण हैं।
भारत सरकार विदेशी यूनिवर्सिटियों में छात्रों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठा रही है?
सरकार ने भारतीय दूतावासों में विशेष अधिकारी तैनात किए हैं जो छात्रों के संपर्क में रहते हैं। सीनियर अधिकारी समय-समय पर यूनिवर्सिटी जाकर छात्रों से सीधे बात करते हैं और वहां की चुनौतियों के समाधान के लिए स्थानीय प्रशासन पर दबाव बनाते हैं।
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