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Cold War: परमाणु हथियारों की नई ‘कोल्ड वॉर’

Dhanarekha
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Cold War: परमाणु हथियारों की नई ‘कोल्ड वॉर’

चीन पर सीक्रेट टेस्ट का आरोप, 2030 तक 1000 वॉरहेड का लक्ष्य

वाशिंगटन: दुनिया एक बार फिर परमाणु हथियारों की खतरनाक(Dangerous) होड़ की दहलीज पर खड़ी है। अमेरिका ने दावा किया है कि चीन ने 2020 में छिपकर(Cold War) परमाणु परीक्षण किया था और वह अपनी परमाणु शक्ति को उम्मीद से कहीं अधिक तेजी से बढ़ा रहा है। ‘न्यू स्टार्ट’ संधि के खत्म होने के बाद अब रूस, चीन और अमेरिका के बीच त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बन गई है

सीक्रेट विस्फोट का दावा: लोप नूर में हलचल

अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, 22 जून 2020 को चीन के लोप नूर स्थित परीक्षण केंद्र पर 2.75 तीव्रता का विस्फोट(Explosion) दर्ज किया गया था। सहायक सचिव(Cold War) क्रिस्टोफर येव का कहना है कि यह कोई सामान्य माइनिंग ब्लास्ट नहीं, बल्कि एक परमाणु परीक्षण की निशानी थी। रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में चीन के पास 200 परमाणु हथियार थे, जो अब बढ़कर 600 के पार पहुँच चुके हैं और 2030 तक इनके 1,000 से ऊपर जाने का अनुमान है।

संधियों का अंत और नई मिसाइलें: रूस और अमेरिका की तैयारी

परमाणु हथियारों को सीमित करने वाली ‘न्यू स्टार्ट’ संधि के खत्म होने से अब प्रतिबंधों(Cold War) की दीवारें ढह गई हैं। रूस ने हाल ही में ‘बुरेवस्तनिक’ नामक परमाणु ऊर्जा से चलने वाली क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया है, जिसकी रेंज असीमित बताई जा रही है। वहीं, राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी पेंटागन को चीन और रूस के बराबर परमाणु टेस्टिंग शुरू करने का आदेश दे दिया है, जिससे वैश्विक सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है।

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भारत की स्थिति और SIPRI की रिपोर्ट

स्वीडन के थिंक टैंक SIPRI की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के सभी 9 परमाणु संपन्न देश अपने जखीरे को आधुनिक बना रहे हैं। भारत के पास फिलहाल 180 परमाणु वॉरहेड हैं, जबकि पिछले साल यह संख्या 172 थी। भारत अब ‘कैनिस्टराइज्ड’ मिसाइल टेक्नोलॉजी पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जो युद्ध की स्थिति में तुरंत तैनाती की सुविधा देती है। चीन जहाँ हर साल 100 नए वॉरहेड बना रहा है, वहीं उत्तर कोरिया 21वीं सदी में इकलौता देश है जिसने लगातार सक्रिय परमाणु परीक्षण किए हैं।

‘न्यू स्टार्ट’ (New START) संधि क्या थी और इसके खत्म होने का क्या मतलब है?

यह अमेरिका और रूस के बीच रणनीतिक परमाणु हथियारों(Cold War) को 1,550 तक सीमित रखने की एक संधि थी। इसके खत्म होने का मतलब है कि अब दोनों देशों पर परमाणु हथियारों की संख्या और तैनाती को लेकर कोई कानूनी पाबंदी नहीं रही, जिससे हथियारों की नई दौड़ शुरू हो सकती है।

परमाणु परीक्षणों का आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ता है?

परमाणु परीक्षणों से निकलने वाले रेडिएशन का स्वास्थ्य पर भयानक असर होता है। एक रिसर्च के मुताबिक, अमेरिका में पूर्व में हुए परीक्षणों के कारण लगभग 6.9 लाख लोगों की मौत हुई या उन्हें गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हुईं। इसी कारण 1992 के बाद अमेरिका ने कोई विस्फोटक परीक्षण नहीं किया है।

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