महंगाई का डर बरकरार
नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की 6-8 अप्रैल की बैठक से बाजार को ब्याज दरों में कटौती की जो उम्मीद थी, उस पर पश्चिम एशिया के तनाव ने पानी फेर दिया है। SBI रिसर्च की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, रेपो रेट फिलहाल 5.25% पर ही स्थिर रहने की संभावना है। ईरान-इजरायल संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुए व्यवधान ने वैश्विक तेल बाजार को 1973 के बाद के सबसे बड़े संकट में डाल दिया है। कच्चे तेल की कीमतें $110 के पार होने के कारण आरबीआई फिलहाल कोई भी जोखिम लेने के मूड में नहीं है।
रुपये की गिरावट और ‘इंपोर्टेड इन्फ्लेशन’ की चुनौती
घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चिंता डॉलर के मुकाबले रुपये का 93 के पार जाना है। जब रुपया कमजोर होता है और कच्चा तेल महंगा होता है, तो भारत(India) में ‘इंपोर्टेड इन्फ्लेशन’ (आयातित महंगाई) बढ़ती है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह पहले ही 5.4% तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा, ‘सुपर अल नीनो’ का खतरा कृषि पैदावार को प्रभावित कर सकता है, जिससे आने वाली तीन तिमाहियों तक खुदरा महंगाई 4.5% से ऊपर बनी रह सकती है। इन्ही कारणों से आरबीआई का पूरा ध्यान अभी महंगाई को नियंत्रित करने पर होगा।
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लिक्विडिटी मैनेजमेंट और ‘ऑपरेशन ट्विस्ट’
ब्याज दरों में बदलाव न करने के साथ-साथ आरबीआई बाजार में नकदी (Liquidity) को संतुलित करने पर जोर दे सकता है। चर्चा है कि केंद्रीय बैंक ‘ऑपरेशन ट्विस्ट’ का सहारा ले सकता है, जिसमें लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड खरीदे जाते हैं और कम अवधि के बॉन्ड बेचे जाते हैं ताकि बॉन्ड यील्ड को स्थिर रखा जा सके। इसके अतिरिक्त, मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी को रोकने के लिए आरबीआई कड़े कदम उठा सकता है, जिससे बैंकों के परिचालन में कुछ चुनौतियां आ सकती हैं, लेकिन यह व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी माना जा रहा है।
‘इंपोर्टेड इन्फ्लेशन’ क्या है और यह भारत को कैसे प्रभावित करती है?
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं या डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है, तो आयात महंगा हो जाता है। इस महंगे आयात के कारण घरेलू बाजार में जो महंगाई बढ़ती है, उसे ‘इंपोर्टेड इन्फ्लेशन’ कहते हैं। इससे भारत में पेट्रोल, डीजल और माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है।
आरबीआई की मौद्रिक नीति में ‘रेपो रेट’ का क्या महत्व है?
रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई व्यावसायिक बैंकों को कर्ज देता है। यदि रेपो रेट स्थिर रहता है, तो आपके लोन (होम लोन, कार लोन) की ईएमआई (EMI) कम होने की संभावना कम हो जाती है। महंगाई बढ़ने के डर से आरबीआई अक्सर रेपो रेट को ऊंचा रखता है ताकि बाजार में मुद्रा का प्रवाह कम किया जा सके।
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