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Rupee: रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर: 92.05 के पार पहुंचा डॉलर

Dhanarekha
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Rupee: रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर: 92.05 के पार पहुंचा डॉलर

रिकॉर्ड गिरावट और वैश्विक कारण

नई दिल्ली: भारतीय रुपया(Rupee) आज 4 मार्च को अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 92.05 पर बंद हुआ। इस गिरावट की मुख्य वजह मिडिल-ईस्ट में बढ़ता तनाव, विशेष रूप से इजराइल(Israel) और ईरान के बीच छिड़ा युद्ध है। कच्चे तेल की कीमतें $85 प्रति बैरल के पार जाने से डॉलर की मांग बढ़ गई है, जिसका सीधा दबाव भारतीय मुद्रा पर पड़ा है। साल 2026 में अब तक रुपया 2% से ज्यादा टूट चुका है, जिससे यह उभरते बाजारों (Emerging Markets) की सबसे कमजोर मुद्राओं में से एक बन गया है

आम आदमी की जेब पर सीधा असर

रुपए के कमजोर होने का सीधा असर आम जनता की ईएमआई (EMI) और खर्चों पर पड़ेगा। चूंकि भारत अपनी जरूरत का 80% तेल आयात करता है, इसलिए डॉलर महंगा(Rupee) होने से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं। इसके अलावा, विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों का खर्च बढ़ जाएगा और मोबाइल, लैपटॉप जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण महंगे होंगे क्योंकि कंपनियां इनका भुगतान डॉलर में करती हैं। आयात महंगा होने से देश में महंगाई बढ़ने का भी खतरा पैदा हो गया है।

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बाजार विशेषज्ञों की राय और भविष्य

विशेषज्ञों और रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, रुपए(Rupee) की अगली चाल पूरी तरह से युद्ध की स्थिति और ग्लोबल ऑयल मार्केट पर टिकी है। जब तक भू-राजनीतिक तनाव कम नहीं होता, रुपए पर दबाव बना रहेगा। हालांकि, उम्मीद की जा रही है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बाजार में हस्तक्षेप करके रुपए को और अधिक गिरने से रोकने की कोशिश करेगा। डॉलर की तुलना में विदेशी निवेशकों का रुझान अब सुरक्षित निवेश (Safe Haven) की ओर बढ़ रहा है, जिससे भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकलकर डॉलर में जा रहा है।

रुपए के गिरने से पेट्रोल और डीजल की कीमतें क्यों बढ़ सकती हैं?

भारत अपनी तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से खरीदता है और इसका भुगतान डॉलर में किया जाता है। जब रुपया गिरता है, तो हमें उतना ही तेल खरीदने के लिए ज्यादा रुपए देने पड़ते हैं, जिससे आयात लागत बढ़ जाती है और अंततः पेट्रोल-डीजल महंगा हो जाता है।

करेंसी डेप्रिसिएशन का क्या मतलब है?

जब किसी देश की मुद्रा की वैल्यू अंतरराष्ट्रीय बाजार में दूसरी प्रमुख मुद्रा (जैसे डॉलर) के मुकाबले कम हो जाती है, तो उसे करेंसी डेप्रिसिएशन या मुद्रा का कमजोर होना कहते हैं। यह विदेशी मुद्रा भंडार में कमी या डॉलर की अत्यधिक मांग के कारण होता है।

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