कमजोर मुद्रा को लेकर बड़ी सफाई
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल(Sanjeev Sanyal) ने रुपये में आई हालिया गिरावट को लेकर चिंता की जरूरत से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि रुपये का कमजोर होना अपने आप में किसी आर्थिक संकट का संकेत नहीं है। भारत(India) जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में विकास के दौर के दौरान मुद्रा में दबाव दिखना सामान्य प्रक्रिया है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब रुपया पहली बार 91 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया।
इंडिया इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2025 में बोलते हुए सान्याल ने कहा कि रुपये की मौजूदा स्थिति को घबराहट के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। नई दिल्ली(New Delhi) में आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने साफ किया कि ऐतिहासिक अनुभव बताता है कि ऊंची विकास दर के साथ कई बार करेंसी कमजोर रहती है। डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट पर मची चर्चा को उन्होंने जरूरत से ज्यादा बताया।
विकास और मुद्रा का ऐतिहासिक संबंध
सान्याल ने अन्य देशों का उदाहरण देते हुए समझाया कि आर्थिक उछाल के दौरान मुद्रा को जानबूझकर कमजोर रखा गया। जापान की अर्थव्यवस्था जब तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही थी, तब उसकी करेंसी भी कमजोर स्तर पर रही। चीन ने भी 1990 और 2000 के दशक में लंबे समय तक यही नीति अपनाई थी।
उनका कहना था कि करेंसी की कमजोरी तब तक समस्या नहीं बनती जब तक उससे घरेलू महंगाई नहीं बढ़ती। उन्होंने इशारा किया कि भारत में फिलहाल महंगाई नियंत्रण में है और निर्यात प्रतिस्पर्धा को भी इससे खास नुकसान नहीं पहुंचा है। इसलिए रुपये को केवल भावनात्मक नजर से नहीं देखना चाहिए।
बाजार संकेत और सरकारी नजर
सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने भी पहले इसी तरह की राय रखी थी। उन्होंने कहा था कि सरकार मुद्रा में आई गिरावट को लेकर लापरवाह नहीं है, लेकिन इसे असामान्य संकट भी नहीं माना जा रहा। हालांकि हाल के सत्रों में विदेशी पूंजी प्रवाह और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण बाजार में उतार-चढ़ाव दिखा है।
इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया सीमित दायरे में कारोबार करता दिखा। बुधवार को रिकॉर्ड निचले स्तर से इसमें अच्छी रिकवरी भी देखी गई थी। इस बीच विदेशी निवेशकों की चाल और वैश्विक जोखिम भावना रुपये की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रही है।
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व्यापार वार्ता में भारत का रुख
सान्याल ने व्यापार समझौतों पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि भारत यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ आक्रामक तरीके से वार्ता कर रहा है। उनका मानना है कि बातचीत में कुछ समझौते जरूरी होते हैं, लेकिन राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहेंगे।
अमेरिका के साथ संबंधों पर बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत ने न तो किसी मुद्दे को बढ़ाया है और न ही दबाव में झुका है। सरकार संतुलित और आत्मविश्वासी रुख अपनाकर आगे बढ़ रही है, जिससे दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था को फायदा मिलेगा।
रुपये की गिरावट से आम लोगों को क्या असर पड़ेगा
यदि गिरावट से महंगाई नहीं बढ़ती तो रोजमर्रा की जिंदगी पर इसका सीधा असर सीमित रहेगा। आयातित वस्तुएं महंगी हो सकती हैं, लेकिन निर्यात को लाभ मिलता है। सरकार स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है।
अर्थशास्त्री रुपये को लेकर आश्वस्त क्यों हैं
तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रा दबाव सामान्य माना जाता है। मजबूत विकास, नियंत्रित महंगाई और विदेशी निवेश भरोसे की वजह बनते हैं। इसलिए विशेषज्ञ इसे दीर्घकालिक खतरे के रूप में नहीं देख रहे।
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