इस्तीफे और मतभेदों पर खुलकर बात
नई दिल्ली: पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन(Arvind Subramanian) ने जीएसटी को लेकर अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि सरकार छोड़ने की वजह किसी तरह का टकराव नहीं था। उन्होंने स्पष्ट किया कि चार साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद पद छोड़ना स्वाभाविक था। इस दौरान उन्होंने वित्त मंत्री अरुण जेटली(Arun Jaitley) के साथ नीतिगत चर्चाओं और सलाहकार की भूमिका से जुड़ी सीमाओं पर भी खुलकर बात की।
उन्होंने बताया कि यह बयान उनकी किताब ‘ए सिक्स्थ ऑफ ह्यूमैनिटी’ पर हुई चर्चा के दौरान आया। सुब्रमण्यन ने कहा कि सरकार के साथ वैचारिक मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन इन्हें इस्तीफे की वजह मानना गलत होगा। उनके अनुसार उस समय परिस्थितियां और व्यक्तिगत कारण भी निर्णय में शामिल थे।
कार्यकाल और इस्तीफे की पृष्ठभूमि
सुब्रमण्यन(Subramanian) ने बताया कि वे अक्टूबर 2014 से जून 2018 तक केंद्र सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे। इस दौरान उन्होंने वित्त मंत्रालय में रहते हुए कई अहम आर्थिक नीतियों पर काम किया। उन्होंने कहा कि चार साल के बाद किसी भी सलाहकार की प्रभावशीलता स्वाभाविक रूप से कम होने लगती है।
दूसरे पहलू पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय देश भारत(India) की आर्थिक नीतियों को लेकर कई बड़े फैसले हो रहे थे। नई दिल्ली में नीति निर्माण की प्रक्रिया तेज थी और ऐसे माहौल में सलाहकार की भूमिका चुनौतीपूर्ण हो जाती है। इसलिए उन्होंने महसूस किया कि यह आगे बढ़ने का सही समय है।
जीएसटी को लेकर मतभेद
जीएसटी की चर्चा करते हुए सुब्रमण्यन(Subramanian) ने इसे सबसे बड़ा उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि उनकी सिफारिश एक सरल कर संरचना की थी, जिसमें केवल तीन स्लैब होने चाहिए थे। हालांकि शुरुआती दौर में 10 से 12 स्लैब बनाए गए, जिससे व्यवस्था जटिल हो गई।
उन्होंने याद किया कि जीएसटी लागू होने के दौरान वे रोजाना अरुण जेटली को कई संदेश भेजते थे। वे लगातार यह समझाने की कोशिश करते थे कि 28 प्रतिशत का स्लैब नहीं होना चाहिए और अलग-अलग वस्तुओं के लिए सीमित स्लैब ही पर्याप्त होंगे।
अन्य पढ़े: OLA-UBER: ओला-उबर के नए नियम
सलाहकार की भूमिका की सीमाएं
सुब्रमण्यन ने स्वीकार किया कि जीएसटी की जटिल संरचना से वे निराश थे। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि सलाहकार के पास अंतिम निर्णय का अधिकार नहीं होता। उनका काम सुझाव देना और नीति निर्माताओं को समझाने की कोशिश करना होता है।
उन्होंने कहा कि कई बार सलाह स्वीकार नहीं की जाती, लेकिन यह भूमिका का हिस्सा है। एक सलाहकार को धैर्य रखना चाहिए और हर असहमति को व्यक्तिगत रूप से नहीं लेना चाहिए। यही अनुभव उन्हें इस पद से सीखने को मिला।
जीएसटी को लेकर उनकी मुख्य सिफारिश क्या थी
सुब्रमण्यन ने बताया कि वे शुरुआत से ही तीन स्लैब वाली सरल जीएसटी प्रणाली चाहते थे। उनका मानना था कि इससे कर अनुपालन आसान होता और व्यापारियों पर बोझ कम पड़ता। जटिल ढांचे से अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ सकता था।
सलाह न माने जाने पर उनका नजरिया कैसा रहा
उन्होंने कहा कि सलाहकार को ‘मोटी चमड़ी’ रखनी चाहिए। हर सुझाव लागू न होना स्वाभाविक है और इसे अहं का मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। अनुभव से सीखकर आगे बढ़ना ही सही दृष्टिकोण है।
अन्य पढ़े: