CAG का बिहार को लेकर खुलासा ,70,877.61 करोड़ रुपये ? विपक्ष को मिला हथियार

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nitish CAG
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बिहार सरकार 70,877.61 करोड़ रुपये के 49,649 उपयोगिता प्रमाणपत्र (UCs) जमा करने में विफल रही है। CAG ने चेतावनी दी है कि इतनी बड़ी संख्या में लंबित UCs से गबन, दुरुपयोग और धन के दुरुपयोग का जोखिम बढ़ जाता है।

बिहार में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताज़ा रिपोर्ट ने राज्य सरकार की वित्तीय प्रबंधन में गंभीर खामियों को उजागर किया है। 2023-24 के लिए राज्य वित्त पर CAG की रिपोर्ट, जो 24 जुलाई 2025 को बिहार विधानसभा में पेश की गई, के अनुसार, सरकार 70,877.61 करोड़ रुपये के 49,649 उपयोगिता प्रमाणपत्र (UCs) जमा करने में विफल रही है

इन प्रमाणपत्रों के अभाव में यह सुनिश्चित नहीं हो पाया कि आवंटित धनराशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए हुआ या नहीं। CAG ने चेतावनी दी है कि इतनी बड़ी संख्या में लंबित UCs से गबन, दुरुपयोग और धन के दुरुपयोग का जोखिम बढ़ जाता है।

क्या है रिपोर्ट में

रिपोर्ट में बताया गया कि 70,877.61 करोड़ रुपये में से 14,452.38 करोड़ रुपये 2016-17 तक की अवधि से संबंधित हैं। सबसे अधिक लापरवाही वाले विभागों में पंचायती राज, शिक्षा, शहरी विकास, ग्रामीण विकास और कृषि विभाग शामिल हैं। इसके अलावा, 22,130 अमूर्त आकस्मिक (AC) बिलों के खिलाफ 9,205.76 करोड़ रुपये के विस्तृत आकस्मिक (DC) बिल जमा नहीं किए गए, जो वित्तीय अनुशासन का उल्लंघन है और गबन का खतरा पैदा करता है।

राज्य की देनदारियां बढ़ी है

CAG ने यह भी उजागर किया कि 2023-24 में बिहार का कुल बजट 3.26 लाख करोड़ रुपये था, जिसमें से केवल 2.60 लाख करोड़ रुपये (79.92%) ही खर्च किए गए। राज्य ने अपनी कुल बचत 65,512.05 करोड़ रुपये में से केवल 23,875.55 करोड़ रुपये सरेंडर किए। राज्य की देनदारियां पिछले वर्ष की तुलना में 12.34% बढ़ीं, जिसमें आंतरिक ऋण का योगदान 59.26% रहा।

विपक्ष ने इस रिपोर्ट को लेकर नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्षी नेताओं ने इसे “डबल लूट” करार देते हुए जांच और जवाबदेही की मांग की है। सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर गहमागहमी है, जहां कुछ यूजर्स ने इसे भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा मामला बताया, लेकिन चूंकि यह एनडीए सरकार से संबंधित है, इसे दबाए जाने की आशंका जताई।

यह मुद्दा बिहार में आगामी चुनावों में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है, क्योंकि जनता के बीच वित्तीय पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर आक्रोश बढ़ रहा है।

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