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Makar Sankranti : पितामह भीष्म ने मकर संक्रांति का इंतज़ार क्यों किया?

Surekha Bhosle
Surekha Bhosle
Makar Sankranti : पितामह भीष्म ने मकर संक्रांति का इंतज़ार क्यों किया?

महाभारत के महान योद्धा पितामह भीष्म

पितामह भीष्म महाभारत के सबसे महान और धर्मनिष्ठ योद्धाओं में से एक थे। उन्हें अपने पिता राजा शांतनु से इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, जिसके कारण वे अपनी मृत्यु का समय स्वयं चुन सकते थे।

शरशय्या पर पड़े भीष्म और उत्तरायण की प्रतीक्षा

महाभारत युद्ध में अर्जुन के बाणों से घायल होकर भीष्म पितामह (Bhishma Pitamah) शरशय्या पर लेटे रहे।
हालाँकि वे कभी भी प्राण त्याग सकते थे, लेकिन उन्होंने मकर संक्रांति तक प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया।

Makar Sankranti 2026: तीज-त्योहारों पर मृत्यु हो जाने पर लोगों में भ्रम की स्थिति देखी जाती है. कई बार लोगों के मन में ये सवाल भी उठता है कि अगर मकर संक्रांति के दिन किसी के मृत्यु हो जाती है, तो इसके मायने क्या हैं?

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति (Makar Sankranti) का त्योहार आने वाला है. 14 जनवरी को सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करेंगे. इसी दिन ये पावन पर्व मनाया जाएगा. मकर संक्रांति सिर्फ एक पर्व नहीं है, बल्कि अध्यात्मिक दृष्टि से भी इसके कई विशेष पहलू हैं. इस दिन मकर राशि में सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं. शास्त्रों में इसको देवताओं का काल माना गया है. बताया जाता है कि सूर्य देव जब उत्तरायण होते हैं, तो स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं।

लोक मान्यताएं हैं कि उत्तरायण में मरने वालों को मोक्ष मिलता है, जबकि दक्षिणायन के सूर्य में मृत्यु होने वालों को जन्म-मरण के चक्र से गुजरना होता है. तीज-त्योहारों पर मृत्यु हो जाने पर लोगों में भ्रम की स्थिति देखी जाती है. कई बार लोगों के मन में ये सवाल भी उठता है कि अगर मकर संक्रांति के दिन किसी के मृत्यु हो जाती है, तो इसके मायने क्या हैं?

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मकर संक्रांति पर मृत्यु होने पर मिल जाता है मोक्ष

शास्त्रों के जानकारों के अनुसार, अगर मकर संक्रांति या सूर्य देव के उत्तरायण होने पर किसी की मृत्यु हो जाती है, तो उसके लिए स्वर्ग के द्वार खुले होते हैं. मकर संक्रांति पर जिनकी मृत्यु होती है, उनकी आत्माएं बड़ी पुण्य मानी जाती हैं और ऐसी आत्माओं को स्वत: मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है. ये भगवान के दिन माने जाते हैं, इसलिए मृत्यु के बाद आत्मा सीधे भगवान के चरणों में जगह पाती है।

ये बात महाभारत के पितामह भीष्म की काहनी से बेहतर समझी जा सकती है. पितामह भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था. महाभारत के 10वें दिन पितामह भीष्म के शरीर को अर्जुन के बाणों ने बुरी तरह से भेद दिया था. इसके बाद वो घायल होकर रणभूमि पर गिर गए. बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म असहनीय पीड़ा सह रहे थे, लेकिन उन्होंने तुरंत प्राण नहीं त्यागे. क्योंकि उस समय सूर्य देव दक्षिणायन में थे।

बाणों की शय्या पर किया था भीष्म ने इंतजार

शास्त्रों में ये अवधि प्राण त्यागने के लिए अनुकूल नहीं मानी जाती. ये बाद पितामह भीष्म जानते थे. इसलिए उन्होंने प्राण त्यागने के लिए सूर्य देव के उत्तरायण होने का इंतजार किया था. इसके बाद मकर संक्रांति पर जब सूर्य देव उत्तरायण हो गए तब उन्होंने प्राण त्यागे. ऐसा माना जाता है कि इस समय प्राण जाने पर आत्मा को परमागति प्राप्त होती है।

भीष्म पितामह का इतिहास क्या है?वे प्राचीन कुरु साम्राज्य के एक राजनेता और सेनापति थे। अपनी बुद्धि, वीरता, युद्ध कौशल और अटल सिद्धांतों के लिए प्रसिद्ध, भीष्म ने कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान पहले दस दिनों तक, अपने प्राण त्यागने तक, कौरव सेना के सर्वोच्च सेनापति के रूप में कार्य किया। राजा शांतनु और नदी देवी गंगा के पुत्र, उनका मूल नाम देवव्रत था।

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