केवल मंदिरों के विस्तार पर ही 101 करोड़ रुपए खर्च
हैदराबाद। माघ पूर्णिमा (Magh Purnima) के अवसर पर हर दो वर्ष में आयोजित होने वाला मेडारम मेला, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु शामिल होते हैं, इस बार नवीनीकरण कार्यों के कारण और भी अधिक महत्व प्राप्त कर गया है। पिछले वर्षों में जहां हर मेले के लिए अस्थायी व्यवस्थाएं की जाती थीं, वहीं इस बार मंदिरों का पूर्ण रूप से पत्थर के स्थायी ढांचों से पुनर्निर्माण (reconstruction) किया गया है, जो सैकड़ों वर्षों तक टिकेंगे। सरकार ने ये कार्य आदिवासी परंपराओं के अनुरूप तथा आदिवासी बुजुर्गों और पुजारियों के संघ की पूर्ण सहमति से शुरू किए हैं। केवल मंदिरों के विस्तार पर ही 101 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। मंदिर परिसर को ऐतिहासिक स्मारकों की तर्ज पर लगभग 4,000 टन ग्रेनाइट से निर्मित किया गया है।

271 वर्ग मीटर क्षेत्र का प्राकारम जिसमें 46 स्तंभ
मुख्य आकर्षणों में 271 वर्ग मीटर क्षेत्र का प्राकारम जिसमें 46 स्तंभ हैं, 8 स्तंभों वाला गोल गड्डे तथा 50 फीट चौड़ा मुख्य स्वागत द्वार शामिल हैं। मेडारम गड्डे के चारों ओर बनाए जा रहे 32 ग्रेनाइट स्तंभों पर आदिवासी संस्कृति, परंपराएं, जीवनशैली और कोया कबीले का इतिहास मूर्तियों के रूप में उकेरा गया है। 930 वर्ष पुराने कोयाला ताड़पत्र ग्रंथों पर आधारित ये शिल्प विशेष आकर्षण हैं।
सम्मक्का, सरालम्मा, पगिद्दिद्दा राजा, गोविंदराजु, जंपन्ना के साथ-साथ बाघ, हिरण, हाथी और मोर जैसे जंगली जानवरों की प्रतिकृतियां भी उकेरी गई हैं, जो प्रकृति के साथ सामंजस्य में रहने वाले आदिवासियों के जीवन को दर्शाती हैं। भविष्य की पीढ़ियों को आदिवासी इतिहास से अवगत कराने के लिए लगभग 750 कोया परिवारों के नाम और 7,000 से अधिक मूर्तियों को डिजाइन किया गया है।

सड़कों को 60 फीट से बढ़ाकर चार लेन किया गया
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को ध्यान में रखते हुए सड़कों को 60 फीट से बढ़ाकर चार लेन किया गया है। वैज्ञानिक पद्धति से कतारें, वॉच टावर और सराय बनाए गए हैं। 42 स्थानों पर 1,418 एकड़ क्षेत्र में वाहन पार्किंग की व्यवस्था की गई है ताकि किसी प्रकार की परेशानी न हो। इस बीच, मेमेडारम जाने वाले सभी मार्ग वाहनों और श्रद्धालुओं के टेंटों से भरे हुए हैं। विशेष रूप से तडवई मंडल पिछले एक महीने से भीड़भाड़ वाला हो गया है। मेले के मुख्य मार्ग शुरू होने के साथ ही मेदाराम में भी भारी भीड़ उमड़ पड़ी है। पिछली बार जहां लगभग दो करोड़ श्रद्धालु आए थे, वहीं इस बार तीन करोड़ लोगों के आने की उम्मीद है।

श्रद्धालुओं के लिए व्यापक इंतजाम
अधिकारियों का अनुमान है कि पिछले महीने से अब तक एक करोड़ से अधिक श्रद्धालु सम्मक्का सरालम्मा के दर्शन कर चुके हैं। अधिकारियों के अनुसार पहले दिन 30 से 40 लाख श्रद्धालुओं के आने की संभावना है। इसी को देखते हुए श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए व्यापक इंतजाम किए गए हैं। कुल 21 विभागों के समन्वय से 42,027 अधिकारी और कर्मचारी ड्यूटी पर तैनात हैं।
मेले के क्षेत्र को 8 जोन और 42 सेक्टरों में विभाजित किया गया है और विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। सभी सेक्टरों में वॉकी-टॉकी की व्यवस्था की गई है जिससे समन्वय में कोई कठिनाई न हो। चिकित्सा सेवाओं के लिए 108 एंबुलेंस, बाइक एंबुलेंस और मेडिकल कैंप लगाए गए हैं। कल्याण मंडपम में स्थापित अस्पताल के माध्यम से समय-समय पर चिकित्सा सेवाएं प्रदान की जा रही हैं। जिला प्रशासन डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से मेदाराम से जुड़ी जानकारी प्रदर्शित कर रहा है।

आदर्श आयोजन बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा प्रशासन
मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी, राजस्व मंत्री पोंगुलेटी श्रीनिवास रेड्डी और पंचायत राज मंत्री सीतक्का के मार्गदर्शन में, कलेक्टर टी.एस. दीवाकर के नेतृत्व में जिला प्रशासन इस वर्ष के मेडारम मेले को वैश्विक स्तर का आदर्श आयोजन बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। 2026 महाजातरा तिथियों के अनुसार 28 जनवरी को सरालम्मा, गोविंदराजु, पगिद्दाराजा का मंदिर में प्रवेश, 29 जनवरी को चिलकालगुट्टा से सम्मक्का का प्रवेश , 30 जनवरी को श्रद्धालुओं की पूजा और 31 जनवरी को वनप्रवेश के साथ उत्सव का समापन होगा।

2026 में माघ पूर्णिमा कब है?
वर्ष 2026 में माघ मास की पूर्णिमा हिंदू पंचांग के अनुसार 1 फरवरी 2026 (रविवार) को पड़ेगी। इस दिन चंद्रमा पूर्ण होता है। यह तिथि धार्मिक दृष्टि से विशेष मानी जाती है और कई आध्यात्मिक व सांस्कृतिक गतिविधियाँ की जाती हैं।

माघ मास की पूर्णिमा कब है?
हिंदू कैलेंडर में माघ महीने की पूर्ण तिथि हर साल जनवरी–फरवरी के बीच आती है। पंचांग के अनुसार तिथि बदलती रहती है। इस दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कला में होता है और इसे स्नान, दान व पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
माघ पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह दिन पुण्य, तप और आत्मशुद्धि का प्रतीक है। गंगा व अन्य पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व माना गया है। इसे आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष से जोड़ा जाता है।
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