ढाका,। बांग्लादेश में हाल ही में हुए आम चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने बड़ी जीत दर्ज की है। इस जीत के बाद उसके नेता तारिक रहमान (Tariq Rehman) ने नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली है। इसी बीच अंतरिम सरकार चला रहे नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस के कुछ करीबी सलाहकारों के देश छोड़ने या बाहर जाने की कोशिश करने की खबरें सुर्खियों में आ गई हैं।
सत्ता परिवर्तन के बाद बढ़ी हलचल
शपथ ग्रहण के तुरंत बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई। सबसे पहले फैज अहमद तैयब, जो यूनुस के सलाहकार थे और इंटरनेशनल क्राइम्स ट्राइब्यूनल तथा टेलिकॉम (Telecom) मामलों में उनकी मदद कर रहे थे, के जर्मनी जाने की खबर सामने आई। उन्होंने उड़ान बुक कराकर देश छोड़ने के संकेत दिए। बांग्लादेशी मीडिया ने इसे “सर्वप्राइज डिपार्चर” यानी अचानक प्रस्थान करार दिया।
ईमानदारी पर सवाल, भागने की चर्चा
इन घटनाओं के बाद सवाल उठ रहे हैं कि अगर यूनुस की अंतरिम सरकार “ईमानदार” थी, तो उनके सलाहकारों को देश छोड़ने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है। जानकारों का कहना है कि सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक अस्थिरता के कारण कई लोग आशंकित हैं। यूनुस अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के खिलाफ हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद अंतरिम प्रमुख बने थे और चुनाव तक प्रशासन संभाल रहे थे।
‘सेफ एग्जिट’ की तलाश
अब बीएनपी सरकार के गठन के साथ ही यूनुस के कुछ सलाहकारों को डर है कि सत्ता हस्तांतरण के बाद उन पर भ्रष्टाचार या अन्य आरोप लग सकते हैं। इसी वजह से वे “सेफ एग्जिट” यानी सुरक्षित बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं। एनसीपी नेता नसीरुद्दीन पटवारी ने दावा किया कि कई सलाहकार सुरक्षित निकलने की कोशिश में हैं और उन्हें अपनी संपत्ति व कामकाज की पूरी जानकारी जनता के सामने रखनी चाहिए।
सभी नहीं छोड़ रहे देश
हालांकि कुछ सूत्रों का मानना है कि सभी सलाहकार बांग्लादेश छोड़कर नहीं जा रहे हैं। कई लोगों का भरोसा है कि सत्ता परिवर्तन शांतिपूर्ण रहा है और किसी तरह की हिंसा या राजनीतिक प्रतिशोध नहीं होगा। ऐसे में वे देश में ही रहकर हालात पर नजर बनाए हुए हैं।
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पहले से जताई जा रही थी चिंता
इन घटनाओं की पृष्ठभूमि अक्टूबर 2025 तक जाती है, जब एनसीपी नेताओं ने आरोप लगाया था कि कुछ सलाहकार पहले से ही राजनीतिक दलों से अपने संबंध जोड़ रहे हैं और भविष्य को लेकर आशंकित थे। इससे यह संकेत मिलता है कि यूनुस और उनके समर्थकों की लोकप्रियता घटी है और सत्ता हस्तांतरण के समय उनका राजनीतिक भविष्य अनिश्चित नजर आने लगा है।
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