चीन-रूस की घेराबंदी और अमेरिकी कब्जे की तैयारी
वाशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प(Trump) ने स्पष्ट कर दिया है कि ग्रीनलैंड पर नियंत्रण करना अब अमेरिका की रणनीतिक मजबूरी बन गया है। व्हाइट हाउस में तेल और गैस कंपनियों के अधिकारियों के साथ बैठक में उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका(America) ने ग्रीनलैंड पर कब्जा नहीं किया, तो रूस और चीन जैसे देश इस पर काबिज हो जाएंगे। ट्रम्प का मानना है कि रूस और चीन को अपने पड़ोस से दूर रखने के लिए ग्रीनलैंड का मालिकाना हक जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सैन्य ठिकानों के लिए केवल ‘लीज’ (Lease) काफी नहीं है; पूर्ण सुरक्षा के लिए पूर्ण मालिकाना हक आवश्यक है।
दाम और दबाव की दोहरी रणनीति
ट्रम्प प्रशासन ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की नीति अपनाता दिख रहा है। एक तरफ जहां ग्रीनलैंड के प्रत्येक नागरिक को अमेरिका में शामिल होने के लिए ₹9 लाख से ₹90 लाख तक देने का प्रस्ताव(Trump) विचाराधीन है, वहीं दूसरी तरफ ट्रम्प ने चेतावनी दी है कि अगर सौदा आसान तरीके से नहीं हुआ, तो ‘सख्त तरीके’ अपनाए जा सकते हैं। हालांकि डेनमार्क ने साफ़ कर दिया है कि वह अपने क्षेत्र की रक्षा के लिए बिना किसी आदेश के जवाबी कार्रवाई और गोली चलाने के लिए तैयार है, जिससे नाटो देशों के बीच तनाव बढ़ने की आशंका है।
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ग्रीनलैंड का सामरिक और आर्थिक महत्व
अमेरिका की इस जिद के पीछे ग्रीनलैंड की खास भौगोलिक स्थिति और वहां छिपे प्राकृतिक संसाधन हैं। यह क्षेत्र उत्तर अमेरिका और यूरोप के बीच सैन्य और मिसाइल(Trump) निगरानी के लिए ‘फ्रंट लाइन’ का काम करता है। इसके अलावा, ग्लोबल वार्मिंग के कारण पिघलती बर्फ से यहां नए समुद्री व्यापारिक रास्ते खुल रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Elements), तेल और गैस के विशाल भंडार हैं, जिन पर नियंत्रण पाकर अमेरिका चीन की वैश्विक निर्भरता को कम करना चाहता है।
डोनाल्ड ट्रम्प ग्रीनलैंड को लीज पर लेने के बजाय पूरी तरह क्यों खरीदना चाहते हैं?
ट्रम्प(Trump) का तर्क है कि लीज पर लिए गए क्षेत्रों की रक्षा उस मजबूती से नहीं की जा सकती जैसे मालिकाना हक वाले क्षेत्रों की होती है। उनके अनुसार, 100 साल के सौदे कूटनीतिक रूप से कमजोर होते हैं। जब अमेरिका इसका मालिक होगा, तभी वह रूस और चीन की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों से इस क्षेत्र की रक्षा पूरी तरह कर पाएगा।
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच विवाद का नाटो (NATO) पर क्या असर पड़ सकता है?
अमेरिका और डेनमार्क दोनों ही नाटो सैन्य गठबंधन के सदस्य हैं। यदि अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए सैन्य बल या दबाव का इस्तेमाल करता है, तो यह गठबंधन के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ होगा। डेनमार्क की जवाबी हमले की धमकी यह दर्शाती है कि इस मुद्दे पर नाटो के भीतर एक बड़ा आंतरिक संघर्ष पैदा हो सकता है।
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