ब्रसेल्स। वैश्विक भू-राजनीति में एक बार फिर तनावपूर्ण मोड़ आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जे की अपनी पुरानी महत्वाकांक्षा को दोहराने और डेनमार्क सहित अन्य यूरोपीय देशों पर दबाव बनाने के लिए भारी टैरिफ (Heavy Tarrif) लगाने की धमकी ने अंतरराष्ट्रीय हलकों में खलबली मचा दी है। इस विवाद ने निवेशकों और विशेषज्ञों के बीच एक ऐसी चर्चा को जन्म दिया है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव हिला सकती है।
ट्रंप की टैरिफ धमकी से यूरोप में बढ़ी बेचैनी
चर्चा का मुख्य केंद्र यह है कि क्या यूरोप, अमेरिका (America) के लगभग 10 ट्रिलियन डॉलर के एसेट्स (परिसंपत्तियों) को एक आर्थिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।
यूरोप के पास अमेरिका की $10 ट्रिलियन परिसंपत्तियां
अमेरिकी ट्रेजरी डेटा के अनुसार, यूरोपीय संघ के निवेशकों के पास अमेरिकी बॉन्ड्स, स्टॉक्स और अन्य वित्तीय संपत्तियों में 10 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का निवेश है। यदि इसमें ब्रिटेन और नॉर्वे जैसे देशों को भी जोड़ दिया जाए, तो यह आंकड़ा और भी विशाल हो जाता है।
क्या अमेरिका के बॉन्ड और शेयरों की होगी बिकवाली?
वर्तमान में यूरोपीय नीति-निर्माता इस बात पर गंभीरता से मंथन कर रहे हैं कि ट्रंप की आक्रामक नीतियों और संप्रभुता से जुड़े खतरों का जवाब कैसे दिया जाए। बाजार में अटकलें तेज हैं कि क्या यूरोपीय देश अमेरिकी बॉन्ड और शेयरों की बड़े पैमाने पर बिकवाली कर सकते हैं।
अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है गहरा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यूरोप इन परिसंपत्तियों को बाजार में उतारता है, तो इससे अमेरिका की उधारी लागत बढ़ जाएगी और वॉल स्ट्रीट पर भारी दबाव पैदा होगा, क्योंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था विदेशी पूंजी पर काफी हद तक निर्भर है।
यूरोप के लिए भी जोखिम भरा दांव
हालांकि यह कदम दोधारी तलवार की तरह है। इन परिसंपत्तियों का बड़ा हिस्सा निजी निवेशकों के पास है, जिन पर सरकारों का सीधा नियंत्रण नहीं होता। इसके अलावा, अचानक बिकवाली से यूरोपीय निवेशकों और उनके पेंशन फंडों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
पूंजी के हथियारीकरण पर गंभीर बहस
रणनीतिकारों के अनुसार, यूरोपीय देश फिलहाल सीधे टकराव से बचने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ड्यूश बैंक जैसे बड़े वित्तीय संस्थानों द्वारा पूंजी के हथियारीकरण की बात उठाया जाना दर्शाता है कि यह अब केवल काल्पनिक विचार नहीं रह गया है।
डॉलर के लिए खतरा बन सकता है निवेश घाटा
सोसिएते जेनरल के रणनीतिकारों का कहना है कि अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय निवेश घाटा बहुत बड़ा है, जो डॉलर के लिए गंभीर जोखिम बन सकता है। यदि हालात बिगड़ते हैं, तो यूरोपीय सार्वजनिक क्षेत्र के निवेशक अमेरिकी परिसंपत्तियों में नया निवेश रोक सकते हैं या सीमित बिकवाली का रास्ता अपना सकते हैं।
बाजारों में दिखने लगा असर
इस भू-राजनीतिक तनाव का असर वैश्विक बाजारों पर भी दिखने लगा है। सोमवार को अमेरिकी इक्विटी फ्यूचर्स और डॉलर में गिरावट दर्ज की गई, जबकि अनिश्चितता के माहौल में निवेशकों ने सोने और स्विस फ्रैंक जैसे सुरक्षित विकल्पों का रुख किया।
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आर्थिक शीत युद्ध या कूटनीतिक समाधान?
यह स्थिति पिछले साल ट्रंप द्वारा टैरिफ ऐलान के बाद देखे गए बाजार रुझानों की याद दिलाती है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या यह टकराव आर्थिक शीत युद्ध का रूप लेता है या कूटनीति के जरिए इसका हल निकलता है।
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