Artificial Rain के लिए तैयार है दिल्ली, मौसम विभाग ने दी मंजूरी दिल्ली में पहली बार होगा कृत्रिम वर्षा का प्रयोग
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के निवासियों के लिए एक बड़ी खबर है। प्रदूषण से जूझ रही दिल्ली में अब Artificial Rain यानी कृत्रिम वर्षा के ज़रिए राहत दिलाने की तैयारी की जा रही है। मौसम विभाग (IMD) ने इस पायलट प्रोजेक्ट को आधिकारिक मंजूरी दे दी है, जिससे यह राजधानी में पहली बार प्रयोगात्मक तौर पर लागू किया जाएगा।
क्या होता है Artificial Rain?
Artificial Rain एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसे Cloud Seeding कहा जाता है। इसके तहत बादलों में कुछ विशेष रसायन जैसे सिल्वर आयोडाइड या नमक के कण छोड़े जाते हैं, जिससे बादलों में नमी इकट्ठा होती है और वर्षा की प्रक्रिया प्रारंभ होती है।

मुख्य उद्देश्य:
- दिल्ली की वायु गुणवत्ता में सुधार
- लंबे समय से बने स्मॉग और धूल कणों को नीचे लाना
- पर्यावरण को शुद्ध करना
IMD ने क्यों चुना Artificial Rain का विकल्प?
दिल्ली की हवा पिछले कई वर्षों से लगातार “गंभीर” श्रेणी में आंकी जा रही है। खासकर सर्दियों में, जब प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है, ऐसे में Artificial Rain को एक त्वरित समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
पायलट प्रोजेक्ट की विशेषताएं:
- नवंबर 2025 से पहले परीक्षण की संभावना
- IIT कानपुर और IMD मिलकर करेंगे तकनीकी निगरानी
- चुने गए स्थानों पर होगी सीमित स्केल पर वर्षा प्रक्रिया
कहां और कब होगा प्रयोग?
- शुरुआती चरण में दिल्ली-NCR के सबसे प्रदूषित इलाकों में चयन किया गया है।
- मौसम की स्थिति, बादलों की मौजूदगी और आर्द्रता के अनुसार सटीक समय तय किया जाएगा।

Artificial Rain से क्या मिलेंगी राहतें?
- PM 2.5 और PM 10 जैसे खतरनाक कणों में कमी आएगी।
- सांस और फेफड़ों की बीमारियों में राहत मिलेगी।
- स्कूलों और दफ्तरों में प्रदूषण के कारण होने वाले ब्रेक घटेंगे।
क्या हैं चुनौतियाँ?
- मौसम का साथ देना आवश्यक है, बादलों के बिना प्रयोग असफल हो सकता है।
- लंबे समय के लिए समाधान नहीं, यह सिर्फ आपातकालीन उपाय है।
- लागत काफी अधिक है, जिससे बार-बार प्रयोग संभव नहीं।
Artificial Rain की यह पहल दिल्ली जैसे महानगर के लिए एक क्रांतिकारी प्रयोग साबित हो सकती है। यदि यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो अन्य शहरों में भी इसे अपनाया जा सकता है। प्रदूषण से राहत की दिशा में यह पहला बड़ा कदम है, जो विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक मजबूत सेतु बन सकता है।