Constitution words पर उठी आपत्ति, RSS नेता ने दी दलील क्या बदल सकते हैं संविधान के शब्द?
हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) Constitution words के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने एक बयान दिया है, जो देश की राजनीति और संवैधानिक बहस को नई दिशा दे रहा है। उन्होंने भारत के संविधान की प्रस्तावना में शामिल दो शब्दों — “सेक्युलर” और “सोशलिस्ट” — को हटाने की मांग की है।
क्या कहा होसबोले ने?
दत्तात्रेय होसबोले का कहना है कि:
“ये दोनों शब्द 1976 में आपातकाल के दौरान जोड़े गए थे। भारत का मूल स्वभाव इन शब्दों से नहीं जुड़ा है।”
- उन्होंने संविधान की मूल प्रति का हवाला देते हुए कहा कि भारत हमेशा एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक राष्ट्र रहा है।
- इन शब्दों के कारण भारतीय समाज की मूल प्रकृति प्रभावित होती है।

Constitution words पर क्यों बढ़ा विवाद?
संविधान शब्द को लेकर यह बहस पुरानी है, लेकिन हर बार जब कोई राजनीतिक या वैचारिक नेता इस विषय को उठाता है, तो बहस फिर ताजा हो जाती है।
- सेक्युलर और सोशलिस्ट शब्दों को 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया था।
- कुछ विचारकों का मानना है कि यह भारतीय परंपरा और पहचान के विरुद्ध है।
- वहीं संविधानविद और कई विपक्षी नेता इस बदलाव के विरोध में हैं।
किसने क्या प्रतिक्रिया दी?
- विपक्षी नेताओं ने इस बयान की निंदा की है, इसे संवैधानिक मूल्यों पर हमला बताया है।
- वहीं कुछ दक्षिणपंथी विचारकों ने होसबोले के विचारों को “जरूरी और समयोचित” बताया है।

क्या हट सकते हैं ये शब्द?
Constitution words को हटाना कोई सरल प्रक्रिया नहीं है:
- इसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत से संविधान संशोधन की जरूरत होगी।
- साथ ही कई राज्यों की सहमति भी जरूरी होगी।
- यह केवल एक वैचारिक मांग है, व्यवहार में इसे लागू करना मुश्किल है।
Constitution words को लेकर RSS नेता दत्तात्रेय होसबोले की टिप्पणी ने एक बार फिर संविधान की आत्मा को लेकर बहस छेड़ दी है।
इस पर कानूनी प्रक्रिया के साथ-साथ राजनीतिक सहमति और जनचर्चा भी महत्वपूर्ण होगी।
क्या वास्तव में ये शब्द हटेंगे, या फिर यह मांग केवल वैचारिक विमर्श तक सीमित रहेगी — यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।