नई दिल्ली । वर्ष 2026 के पहले मौद्रिक नीति समिति के फैसलों का एलान शुक्रवार को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा (Sanjay Malhotra) ने किया। केंद्रीय बजट 2026 और हाल ही में हुए भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के बाद यह पहली नीतिगत समीक्षा है, जिस पर दलाल स्ट्रीट और आर्थिक जगत की निगाहें टिकी थीं।
रेपो रेट पर यथास्थिति, आरबीआई ने नहीं किया बदलाव
आरबीआई ने इस बार ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है और यथास्थिति बनाए रखी है। मौद्रिक नीति समिति ने उम्मीदों के अनुरूप रेपो रेट को 5.25 फीसदी पर बरकरार रखने का फैसला किया है।
महंगाई नियंत्रण में, अर्थव्यवस्था मजबूत: गवर्नर
पॉलिसी बैठक के बाद आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि देश में महंगाई दर अनुमानित दायरे में बनी हुई है। उन्होंने इसे हाई ग्रोथ (High Growth) और लो इन्फ्लेशन का अनुकूल दौर बताया। गवर्नर के अनुसार, वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन मजबूत रहा है और आगे भी इसमें स्थिरता की उम्मीद है।
विशेषज्ञों की राय: फिलहाल दरों में कटौती से बचने की सलाह
अर्थशास्त्रियों के बीच कराए गए सर्वे में अधिकांश विशेषज्ञों ने ब्याज दरों को लेकर सतर्क रुख अपनाने की बात कही। उनका मानना है कि तब तक दरों में कटौती नहीं की जानी चाहिए, जब तक आर्थिक वृद्धि में बड़ी गिरावट का खतरा न हो। यह सर्वे अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए शुल्क को घटाकर 18 प्रतिशत करने की घोषणा से पहले किया गया था।
जीडीपी ग्रोथ अनुमान में बढ़ोतरी
आरबीआई ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए जीडीपी ग्रोथ अनुमान 7.3 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.4 प्रतिशत कर दिया है। वहीं वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के लिए ग्रोथ अनुमान 6.9 प्रतिशत और दूसरी तिमाही के लिए 7 प्रतिशत रखा गया है। गवर्नर ने बताया कि नई जीडीपी सीरीज आने के कारण पूरे वर्ष का अनुमान जारी नहीं किया गया है।
रेपो रेट क्या है और आम लोगों पर इसका असर
रेपो रेट वह ब्याज दर है, जिस पर भारतीय रिज़र्व बैंक कमर्शियल बैंकों को कर्ज देता है। इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है। रेपो रेट बढ़ने पर होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई महंगी हो जाती है। वहीं दरें घटने पर लोन सस्ते हो सकते हैं, लेकिन सेविंग्स अकाउंट और फिक्स्ड डिपॉजिट पर मिलने वाला ब्याज भी कम हो जाता है।
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पिछले महीनों में कटौती का सिलसिला
दिसंबर में आरबीआई ने ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती की थी। जून में रेपो रेट में 50 बेसिस पॉइंट की कमी की गई थी। इससे पहले फरवरी और अप्रैल में भी 25-25 बेसिस पॉइंट की कटौती हुई थी। इसके पहले लगातार 11 बैठकों तक रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया था।
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