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National- रूस-चीन नजदीकी से बदली वैश्विक राजनीति, भारत के सामने नई चुनौती

Anuj Kumar
Anuj Kumar
National- रूस-चीन नजदीकी से बदली वैश्विक राजनीति, भारत के सामने नई चुनौती

नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय राजनीति इस समय तेज़ी से बदलते दौर से गुजर रही है। यूक्रेन युद्ध (Ukraine War) अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) की आक्रामक विदेश नीति, चीन का बढ़ता दबदबा और बहुपक्षीय संस्थाओं की कमजोर होती भूमिका ने वैश्विक शक्ति संतुलन को अस्थिर कर दिया है। इसी पृष्ठभूमि में रूस-चीन संबंधों और भारत की भूमिका को लेकर नई बहस खड़ी हो गई है।

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की बदली स्थिति

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस (Russia) की स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। पश्चिमी प्रतिबंधों ने रूसी अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है और उसे ऊर्जा, हथियारों तथा तकनीक के लिए चीन पर अधिक निर्भर बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के बीच यह धारणा मजबूत हुई है कि रूस अब रणनीतिक रूप से चीन के अधिक करीब उसके “जूनियर पार्टनर” की भूमिका में दिख रहा है। हालांकि रूस सैन्य शक्ति और परमाणु क्षमता के लिहाज से अब भी एक बड़ा खिलाड़ी है, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर उसकी चीन पर निर्भरता साफ दिखाई देती है।

भारत के लिए क्यों संवेदनशील है रूस-चीन नजदीकी

भारत के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील है। ऐतिहासिक रूप से रूस भारत का भरोसेमंद रक्षा और कूटनीतिक साझेदार रहा है। शीत युद्ध के दौर से लेकर अब तक रूस ने कई मौकों पर भारत का समर्थन किया है। लेकिन बदलते वैश्विक हालात में भारत यह भी देख रहा है कि रूस-चीन की बढ़ती नजदीकी कहीं भारत के रणनीतिक हितों को नुकसान न पहुंचाए, खासकर तब जब चीन भारत का सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी बना हुआ है।

पड़ोसी देशों में चीन का बढ़ता प्रभाव

चीन ने भारत के पड़ोसी देशों—पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और मालदीव—में अपना प्रभाव लगातार बढ़ाया है। ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के ज़रिये चीन ने आर्थिक निवेश और कर्ज़ के माध्यम से इन देशों में गहरी पैठ बना ली है। इसके साथ ही भारत-चीन सीमा पर तनाव, व्यापार घाटा और क्षेत्रीय वर्चस्व की होड़ ने दोनों देशों के रिश्तों को और जटिल बना दिया है।

मल्टी-अलाइनमेंट की राह पर भारत

भारत की विदेश नीति अब पारंपरिक गुटनिरपेक्षता से आगे बढ़कर “मल्टी-अलाइनमेंट” की दिशा में आगे बढ़ चुकी है। अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, रूस के साथ पारंपरिक रक्षा संबंध, यूरोप और जापान के साथ आर्थिक सहयोग और ग्लोबल साउथ में नेतृत्व की कोशिश—यह सब भारत की इसी नीति का हिस्सा है।

सिर्फ कूटनीति नहीं, ताकत भी जरूरी

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल कूटनीति के दम पर भारत “विश्व गुरु” की भूमिका नहीं निभा सकता। इसके लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता, तकनीकी क्षमता, मजबूत रक्षा ढांचा और पड़ोसियों के साथ संतुलित संबंध जरूरी हैं। चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा और सीमावर्ती तनाव भारत की कमजोरियों को उजागर करते हैं। जब तक भारत उत्पादन, तकनीक और बुनियादी ढांचे में चीन के बराबर नहीं पहुंचता, तब तक रणनीतिक बराबरी मुश्किल है।

रूस के साथ संतुलन सबसे बड़ी चुनौती

रूस के संदर्भ में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने की है। भारत न तो रूस को पूरी तरह खो सकता है और न ही चीन-रूस धुरी का हिस्सा बन सकता है। ऐसे में भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को केंद्र में रखकर स्वतंत्र और व्यावहारिक नीति अपनानी होगी।

वर्ल्ड ऑर्डर से वर्ल्ड डिसऑर्डर की ओर दुनिया

कुल मिलाकर, आज की दुनिया “वर्ल्ड ऑर्डर” से “वर्ल्ड डिसऑर्डर” की ओर बढ़ती दिख रही है। इस अराजकता में भारत के लिए अवसर भी हैं और खतरे भी। सवाल यह नहीं है कि भारत विश्व गुरु है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत इस अस्थिर वैश्विक व्यवस्था में अपने हितों की रक्षा करते हुए एक जिम्मेदार और प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभर सकता है। यही आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी कसौटी होगी।

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