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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

Author Icon By Dhanarekha
Updated: May 7, 2026 • 6:38 PM
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धार्मिक प्रथाओं को हर बार चुनौती देना समाज के लिए जोखिम भरा

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि हर धार्मिक प्रथा और रिवाज को अदालतों(Courts) में चुनौती दी जाने लगी, तो इससे धर्म और समाज का ताना-बाना टूट सकता है। जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि भारत में धर्म समाज के साथ गहराई से जुड़ा है। यदि मंदिर के खुलने-बंद होने या हर छोटे रिवाज पर सवाल उठेंगे, तो अदालतों में याचिकाओं की बाढ़ आ जाएगी और सामाजिक स्थिरता(Social Stability) पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा

दाऊदी बोहरा समुदाय और 40 साल पुरानी याचिका

यह बहस दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘एक्सकम्युनिकेशन’ (समुदाय से बाहर करना) की प्रथा से जुड़ी 40 साल पुरानी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान हुई। कोर्ट ने 1962 के उस पुराने फैसले का जिक्र किया जिसमें धार्मिक आधार पर निष्कासन को समुदाय के आंतरिक प्रबंधन का हिस्सा माना गया था। हालांकि, सुधारवादी समूहों का तर्क है कि यदि कोई प्रथा किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो उसे अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिलने वाली धार्मिक सुरक्षा नहीं दी जानी चाहिए।

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सबरीमाला और विविधता का सम्मान

सबरीमाला मामले में केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। सरकार ने दलील दी कि जिस तरह कुछ मंदिरों में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है, वैसे ही देश में कई ऐसे मंदिर भी हैं जहाँ पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। जस्टिस नागरत्ना ने भारत की पहचान उसकी विविधता और सभ्यता से जोड़ते हुए कहा कि धर्म इसमें एक स्थायी तत्व है और इसे कानूनी पेचीदगियों में उलझाकर तोड़ना सही नहीं होगा।

जस्टिस नागरत्ना ने धार्मिक प्रथाओं को चुनौती देने पर क्या चिंता व्यक्त की?

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि धर्म भारतीय समाज का अभिन्न अंग है। यदि हर रिवाज को कोर्ट में चुनौती दी जाएगी, तो मंदिर के प्रबंधन जैसे छोटे मामलों पर भी सैकड़ों केस आएंगे, जिससे अदालतों पर बोझ बढ़ेगा और समाज की विविधता व स्थिरता पर बुरा असर पड़ेगा।

1962 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में दाऊदी बोहरा समुदाय को लेकर क्या कहा गया था?

1962 के फैसले में कोर्ट ने ‘बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्सकम्युनिकेशन एक्ट’ को रद्द कर दिया था। कोर्ट का मानना था कि किसी सदस्य को समुदाय से बाहर करने का अधिकार समुदाय के धार्मिक मामलों के प्रबंधन का हिस्सा है और यह अनुच्छेद 26(बी) के तहत सुरक्षित है।

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