Tamilnadu- तमिलनाडु की राजनीति में हलचल, कांग्रेस-डीएमके संबंधों में खिंचाव

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कांग्रेस-डीएमके
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नई दिल्ली। तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय से साथ चल रहे कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के रिश्तों में एक बार फिर तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रम ने संकेत दिए हैं कि दशकों पुराना यह गठबंधन अब टूट की ओर बढ़ सकता है।

विजय से मुलाकात ने बढ़ाई सियासी हलचल

विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के पांच विधायकों का अभिनेता और तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) प्रमुख विजय से मुलाकात करना राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि इन विधायकों ने विजय को समर्थन देने का फैसला किया है। कांग्रेस और डीएमके (Congress and DMK) ने विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा था, लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद से ही दोनों दलों के बीच मतभेदों की खबरें सामने आने लगी थीं। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि डीएमके उन्हें सरकार और संगठन में अपेक्षित महत्व नहीं दे रही थी।

विजय की पार्टी ने बदला राजनीतिक समीकरण

राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस विधायकों का विजय के साथ जाना चर्चा का विषय बना हुआ है। विजय की पार्टी टीवीके ने चुनाव में 108 सीटें जीतकर सभी को चौंका दिया। हालांकि पार्टी बहुमत से कुछ सीटें पीछे रह गई थी। अब कांग्रेस के समर्थन के बाद विजय सरकार गठन की संभावनाओं को मजबूत करने में जुट गए हैं। दूसरी ओर डीएमके ने कांग्रेस के इस कदम को जनादेश के खिलाफ बताते हुए इसे ‘पीठ में छुरा घोंपने’ जैसा करार दिया है।

1960 के दशक से शुरू हुआ था रिश्ता

कांग्रेस और डीएमके के राजनीतिक रिश्तों की शुरुआत 1960 के दशक में हुई थी। 1967 के विधानसभा चुनाव में सीएन अन्नादुरई के नेतृत्व में डीएमके ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था। इसके बाद कांग्रेस तमिलनाडु में अपने दम पर कभी सरकार नहीं बना सकी। हालांकि 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को केंद्र में सरकार बचाने के लिए क्षेत्रीय दलों के समर्थन की जरूरत थी और उस समय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने उनका साथ दिया।

1971 में गठबंधन ने रचा था इतिहास

1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और डीएमके का गठबंधन बेहद सफल साबित हुआ था। दोनों दलों ने मिलकर तमिलनाडु की 39 में से 38 सीटों पर जीत हासिल की थी। इस जीत ने इंदिरा गांधी को केंद्र में मजबूत बहुमत दिलाने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन समय के साथ दोनों दलों के रिश्तों में दरार आने लगी। डीएमके सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और राज्यों को अधिक अधिकार देने की मांग ने केंद्र की राजनीति से टकराव पैदा कर दिया।

आपातकाल बना रिश्तों में सबसे बड़ा मोड़

1975 में लगाए गए आपातकाल के दौरान डीएमके ने खुलकर विरोध किया था। इसके बाद 1976 में इंदिरा गांधी सरकार ने करुणानिधि सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। उस दौर में एमके स्टालिन, मुरासोली मारन समेत कई डीएमके नेताओं को मीसा कानून के तहत जेल भेजा गया। डीएमके आज भी उस दौर को अपने राजनीतिक इतिहास का सबसे काला अध्याय मानती है।

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फिर साथ आए, अब फिर बढ़ी दूरी

राजनीति में बदलते समीकरणों के बीच बाद के वर्षों में कांग्रेस और डीएमके फिर साथ आए। 2004 से 2013 तक डीएमके संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार का हिस्सा रही। हाल के वर्षों में भी दोनों दल ‘इंडिया’ गठबंधन के प्रमुख सहयोगी माने जाते रहे हैं। लेकिन अब कांग्रेस का विजय और टीवीके की ओर झुकाव यह संकेत दे रहा है कि तमिलनाडु की राजनीति में एक नया गठबंधन आकार ले सकता है। ऐसे में कांग्रेस और डीएमके की पुरानी दोस्ती एक बार फिर इतिहास बनने की ओर बढ़ती नजर आ रही है।

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Anuj Kumar

लेखक परिचय

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