Supreme Court ने जताई नाराज़गी, जमानत के बाद भी न हुई रिहाई जमानत के बावजूद बंदी को जेल से नहीं छोड़ा गया
एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जिसमें एक व्यक्ति को अदालत से जमानत मिलने के बावजूद कई महीनों तक रिहा नहीं किया गया।
यह मामला जैसे ही सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में आया, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर कड़ी टिप्पणी की।
मानवाधिकार का उल्लंघन मानते हुए सख्त टिप्पणी
Supreme Court ने इसे व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन माना और कहा कि किसी को जमानत मिलने के बाद जेल में रखना कानून और न्याय दोनों के खिलाफ है।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह की लापरवाही “गंभीर प्रशासनिक विफलता” को दर्शाती है।

यूपी सरकार को 5 लाख मुआवजा देने का आदेश
न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि पीड़ित व्यक्ति को 5 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।
यह मुआवजा मानसिक, सामाजिक और संवैधानिक पीड़ा की भरपाई के तौर पर दिया जाएगा।
सरकारी वकील की सफाई और कोर्ट की प्रतिक्रिया
सरकारी पक्ष ने इस देरी का कारण तकनीकी भूल और कागजी प्रक्रियाओं में देरी बताया, लेकिन कोर्ट इससे संतुष्ट नहीं हुआ। न्यायमूर्ति ने कहा,
“अगर कोर्ट का आदेश समय पर लागू नहीं होता, तो आम नागरिक कैसे न्याय की उम्मीद करे?”

कानूनविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया
- कई कानून विशेषज्ञों ने इस फैसले का स्वागत किया
- इसे न्यायपालिका की सक्रियता और संवेदनशीलता का उदाहरण बताया
- यह मामला भविष्य में प्रशासन को सतर्क करने का कार्य करेगा
Supreme Court का यह फैसला यह दर्शाता है कि भारत की न्यायपालिका अब नागरिकों के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को गंभीरता से ले रही है। जमानत के बावजूद जेल में रखना न केवल कानून का अपमान है, बल्कि यह लोकतंत्र में आम आदमी के अधिकारों पर चोट है।
अदालत द्वारा दिया गया मुआवजा एक चेतावनी है कि कानून का पालन न करने पर जवाबदेही तय की जाएगी।