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News Hindi : सीतक्का ने हथकरघा उत्पाद खरीदकर बुनकरों को सशक्त बनाने की अपील की

Ajay Kumar Shukla
Ajay Kumar Shukla
News Hindi : सीतक्का ने हथकरघा उत्पाद खरीदकर बुनकरों को सशक्त बनाने की अपील की

हैदराबाद। पंचायत राज एवं ग्रामीण विकास मंत्री सीतक्का (Panchayat Raj and Rural Development Minister Seethakka) ने सोमवार को हैदराबाद के आबिड्स में स्थित तेलंगाना राज्य हथकरघा सहकारी संस्था (TGSCO) की दुकान का दौरा किया। इस अवसर पर हथकरघा एवं वस्त्र विभाग की प्रधान सचिव शैलजा रामैयर ने मंत्री का स्वागत किया और दुकान के विभिन्न अनुभागों की जानकारी दी। मंत्री ने कहा कि हथकरघा बुनकर पीढ़ियों के अनुभव, कौशल और कठिन परिश्रम से सुंदर डिज़ाइन वाली साड़ियाँ तैयार कर रहे हैं।

हथकरघा उत्पादों को दें बढ़ावा

उन्होंने कहा कि यहां उपलब्ध साड़ियाँ परंपरा की प्रतीक होने के साथ-साथ आधुनिक महिलाओं को भी आकर्षित कर रही हैं। सीतक्का ने कहा कि हथकरघा उत्पादों को बढ़ावा देकर हम बुनकरों की मेहनत और समर्पण का सम्मान कर सकते हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे टीजीएससीओ जैसे सरकारी उद्देश्य से संचालित हथकरघा एम्पोरियम्स से त्योहारों और शुभ अवसरों पर खरीदारी कर बुनकर समुदाय को प्रोत्साहित करें। मंत्री ने आगामी सम्मक्का-सरलम्मा जातरा में श्रद्धालुओं के लिए हथकरघा साड़ियों की बिक्री हेतु टीजीएससीओ को स्टॉल लगाने का भी आमंत्रण दिया।

हथकरघा से आप क्या समझते हैं?

हाथ से चलने वाले करघे पर सूत या धागों से कपड़ा बुनने की प्रक्रिया को हथकरघा कहा जाता है। इसमें बिजली या मशीन का उपयोग नहीं होता। यह पारंपरिक तकनीक कारीगरों की कुशलता, धैर्य और कला का प्रतीक मानी जाती है।

हथकरघा कौन सा उद्योग है?

यह एक कुटीर एवं ग्रामीण उद्योग माना जाता है। यह मुख्य रूप से गांवों और छोटे कस्बों में संचालित होता है। इसमें स्थानीय कारीगरों को रोजगार मिलता है और कम पूंजी में पारंपरिक वस्त्रों का उत्पादन किया जाता है।

हथकरघा उद्योग क्या है?

हाथ से करघा चलाकर सूत से कपड़ा बनाने से संबंधित गतिविधियों को हथकरघा उद्योग कहा जाता है। इसमें साड़ी, दुपट्टा, शॉल और कपड़े तैयार किए जाते हैं। यह उद्योग आत्मनिर्भरता, रोजगार और पारंपरिक वस्त्र संस्कृति को बढ़ावा देता है।

हथकरघा शिल्प क्या है?

यह शिल्प वस्त्र बुनाई से जुड़ी एक पारंपरिक कला है। इसमें रंग, डिज़ाइन और बुनाई की विशेष तकनीकों का प्रयोग होता है। यह शिल्प क्षेत्रीय पहचान, सांस्कृतिक विरासत और कारीगरों की रचनात्मकता को दर्शाता है।

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