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Elon musk : टेस्ला की भारत में एंट्री कल से शुरू

Surekha Bhosle
Surekha Bhosle
Elon musk : टेस्ला की भारत में एंट्री कल से शुरू

जिसने कंपनी बनाई उसे ही मस्क ने निकाला, 2008 में टेस्ला डूबने वाली थी

साल 2008 की बात है। दुनियाभर की इकोनॉमी संकट में थी। लेहमन ब्रदर्स जैसे बड़े इन्वेस्टमेंट बैंक से लेकर जनरल मोटर्स जैसी कंपनियां डूब रही थीं। इलॉन मस्क (elon musk) की इलेक्ट्रिक व्हीकल कंपनी टेस्ला (Tesla) शुरुआती दौर में थी। मंदी के कारण हालत इतनी खराब थी कि मस्क (Musk) ने पहली कार के लिए ग्राहकों से जो बुकिंग अमाउंट लिया था उसे भी खर्च कर दिया। एम्प्लॉइज को सैलरी देने के लिए पैसे नहीं थे

अपने खर्चों को कवर करने के लिए उन्होंने निजी तौर पर रकम उधार ली थी। वे उस समय बेहद तनाव में रहने लगे थे। उनकी गर्लफ्रेंड रही तालुलाह रिले ने इस वाकये को याद करते हुए कहा- ‘वह खुद से बात करने लगे थे, अपने हाथों को फैलाकर जोर-जोर से चिल्लाते थे। कई बार नींद में भी चिल्लाते थे और हाथ पटकते थे। लगता था कि उन्हें कभी भी दिल का दौरा पड़ सकता है।’

आज टेस्ला Tesla मार्केट कैप में दुनिया की सबसे बड़ी इलेक्ट्रिक व्हीकल कंपनी है। ये कंपनी अब भारत में भी अपना शोरूम खोलने जा रही है। 15 जुलाई को मुंबई में इसकी शुरुआत होगी। ऐसे में यहां हम डूबने की कगार पर खड़ी टेस्ला की कामयाब होने की कहानी बता रहे हैं…

टेस्ला की शुरुआत

टेस्ला Tesla की कहानी शुरू होती है दो इंजीनियर्स, मार्टिन एबरहार्ड और मार्क टारपेनिंग से। इन्होंने 2003 में टेस्ला मोटर्स की नींव रखी। बाद में इयान राइट और जेबी स्ट्रॉबेल भी टीम में जुड़े।

एबरहार्ड और टारपेनिंग 1980 के दशक में मिले थे। वे पहले एकसाथ न्यूवोमीडिया नाम की कंपनी में काम कर चुके थे। यहां उन्होंने रॉकेट ई-बुक रीडर बनाया था।

मार्टिन को स्पोर्ट्स कार बहुत पसंद थी और एक ऐसी कार चाहते थे जो तेज हो और पर्यावरण को नुकसान भी न पहुंचाए। उस वक्त मिडिल ईस्ट में युद्ध चल रहा था। ग्लोबल वॉर्मिंग की चिंता बढ़ रही थी। मार्टिन को लगा कि पेट्रोल गाड़ियां खरीदना सही नहीं। यहीं से टेस्ला का ख्याल आया।

मार्टिन और मार्क ने देखा कि ई-बुक रीडर में उन्होंने जो लीथियम-आयन बैटरी इस्तेमाल की थी वो कारों के लिए भी क्रांतिकारी हो सकती है। उन्होंने AC प्रॉपल्शन नाम की एक छोटी कंपनी के साथ मिलकर एक प्रोटोटाइप बनाया, जो बाद में टेस्ला रोडस्टर का आधार बना।

हालांकि, गाड़ी बनाना आसान नहीं था। उन्हें ऑटोमोटिव इंडस्ट्री का कोई अनुभव नहीं था और सप्लायर्स को उनके साथ काम करने में रिस्क दिखता था। फिर भी, उन्होंने लोटस जैसी कंपनियों के साथ पार्टनरशिप की और 1 जुलाई 2003 को टेस्ला को शुरू किया।

इलॉन मस्क की एंट्री

इलॉन मस्क आज टेस्ला का सबसे बड़ा चेहरा हैं, लेकिन वो इसके फाउंडर नहीं थे। 2004 में मस्क ने टेस्ला Tesla में 65 लाख डॉलर का निवेश किया और कंपनी के चेयरमैन बने। आज के हिसाब से रुपए में ये रकम करीब 56 करोड़ रुपए होती है। 10 लाख डॉलर अन्य निवेशकों ने भी लगाए थे।

जब टेस्ला Tesla मोटर्स की शुरुआत हुई, उस वक्त इलॉन मस्क स्पेसएक्स पर काम कर रहे थे। उसी दौरान उनकी मुलाकात जेबी स्ट्रॉबेल से हुई। स्ट्रॉबेल एक युवा इंजीनियर और इलेक्ट्रिक गाड़ियों के फैन थे। स्ट्रॉबेल ने अपने गैरेज में खुद एक पोर्श को इलेक्ट्रिक गाड़ी में बदला था।

स्ट्रॉबेल ने मस्क को AC प्रॉपल्शन नाम की एक छोटी कंपनी के बारे में बताया, जो इलेक्ट्रिक गाड़ियां बनाती थी। दोनों ने AC प्रॉपल्शन की tZero गाड़ी का टेस्ट ड्राइव लिया, जिसमें लीथियम-आयन बैटरी थी।

मस्क को ये गाड़ी इतनी पसंद आई कि वो इसे कॉमर्शियल करने के लिए AC प्रॉपल्शन के CEO टॉम गेज को मनाने लगे, लेकिन गेज इसके लिए तैयार नहीं हुए। फिर गेज ने मस्क को मार्टिन से मिलवाया, जो टारपेनिंग और इयान राइट के साथ मिलकर टेस्ला मोटर्स शुरू कर चुके थे। यहीं से मस्क की एंट्री टेस्ला में हुई।

पहली कार रोडस्टर

टेस्ला की पहली गाड़ी थी रोडस्टर, जिसे लोटस एलिस के चेसिस पर बनाया जाना था। कंपनी का प्लान था कि लोटस के मौजूदा पार्ट्स का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करके लागत कम रखी जाए। लेकिन मस्क को ये मंजूर नहीं था। वो चाहते थे कि रोडस्टर इतनी खूबसूरत और पावरफुल हो कि लोग इसे देखकर दंग रह जाएं।

मस्क हर दो हफ्ते में लॉस एंजिल्स से सिलिकन वैली आते, डिजाइन मीटिंग्स में हिस्सा लेते और गाड़ी के मॉडल्स की जांच करते। उनकी सलाह सिर्फ सुझाव नहीं थी। वो चाहते थे कि हर बदलाव लागू हो।

उन्होंने 5 बड़े बदलाव करवाए:

1. दरवाजे का डिजाइन: मस्क को रोडस्टर का दरवाजा बहुत छोटा लगा। उन्होंने दरवाजे का फ्रेम तीन इंच नीचे करवाया। इससे चेसिस का डिजाइन बदल गया और 20 लाख डॉलर की अतिरिक्त लागत आई।

2. सीट्स: मस्क को लोटस की सीट्स तंग लगीं। वो चाहते थे कि सीट्स चौड़ी हों। महिलाओं को इसमें बैठने में आसानी हो। एबरहार्ड को ये बदलाव बेकार लगा, क्योंकि इससे टेस्टिंग दोबारा करनी पड़ी।

3. हेडलाइट्स: मस्क को लोटस की हेडलाइट्स “बग-आइड” (कीड़े जैसी) लगीं। उन्होंने कवर वाली हेडलाइट्स लगवाने का फैसला किया, जिससे 5 लाख डॉलर की लागत बढ़ी।

4. कार्बन फाइबर बॉडी: मस्क ने लोटस के फाइबरग्लास की जगह मजबूत और हल्के कार्बन फाइबर का इस्तेमाल करवाया। इससे गाड़ी की पेंटिंग महंगी हो गई, लेकिन वो ज्यादा ठोस और हल्की बनी।

5. इलेक्ट्रिक डोर हैंडल्स: एबरहार्ड साधारण डोर हैंडल्स से खुश थे, लेकिन मस्क ने इलेक्ट्रिक टच-सेंसिटिव हैंडल्स लगवाए, जो टेस्ला की “कूल” इमेज का हिस्सा बने।

टेस्ला ने भारत क्यों छोड़ा?

लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय ईवी बाजार अभी इतना परिपक्व नहीं हुआ है कि टेस्ला स्थानीय स्तर पर निवेश कर सके – ईवी की बिक्री अभी भी भारत में कुल यात्री वाहन बिक्री का 3% से भी कम है, और स्थानीय स्तर पर निर्मित विकल्पों की कीमत टेस्ला के बेस मॉडल के लिए उपभोक्ताओं को चुकानी पड़ने वाली कीमत की आधी हो सकती है।

टेस्ला का मालिक कौन है?

हालाँकि टेस्ला एक सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाली कंपनी है, लेकिन इसके कई प्रमुख शेयरधारक हैं जो सामूहिक रूप से इसके शेयरों के मालिक हैं, जिनमें संस्थागत निवेशक और इसके सीईओ, एलन मस्क, जो सबसे बड़े व्यक्तिगत शेयरधारक हैं, शामिल हैं।

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