बीजिंग । मध्य पूर्व (Middile East) में जारी भीषण संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuzz) में बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। तेल आपूर्ति बाधित होने के डर से दुनिया भर के देश संकट में हैं, लेकिन इस बीच चीन ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए एक वैकल्पिक और रणनीतिक रास्ता निकाल लिया है।
म्यांमार: चीन का रणनीतिक ‘बैकडोर’
ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीजिंग अब म्यांमार को केवल एक पड़ोसी देश के रूप में नहीं, बल्कि हिंद महासागर में प्रवेश करने के लिए अपने सबसे सुरक्षित ‘बैकडोर (Backdoor) के रूप में देख रहा है। चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा (CMEC) अब बीजिंग के लिए केवल एक व्यापारिक मार्ग नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण रणनीतिक ढाल बन चुका है।
‘मलक्का डिलेमा’ और समुद्री घेराबंदी का डर
चीन की अर्थव्यवस्था का आधार समुद्री व्यापार है, जिसका लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा हिंद महासागर से होकर गुजरता है। चीन द्वारा आयात किए जाने वाले कुल कच्चे तेल का 80 प्रतिशत इसी रास्ते से आता है। बीजिंग को लंबे समय से ‘मलक्का डिलेमा’ का डर सता रहा है, यानी उसे अंदेशा है कि युद्ध जैसी स्थिति में अमेरिका और भारत मलक्का जलडमरूमध्य और निकोबार गैप को बंद कर सकते हैं।
क्यायुकफ्यू से कुनमिंग: तेल और गैस की महा-पाइपलाइन
इस संभावित घेराबंदी से बचने के लिए चीन ने म्यांमार के क्यायुकफ्यू बंदरगाह से लेकर अपने कुनमिंग शहर तक दो विशाल पाइपलाइनें बिछाई हैं।
- तेल पाइपलाइन: इसकी क्षमता सालाना 2.2 करोड़ टन कच्चा तेल ले जाने की है।
- गैस पाइपलाइन: यह सालाना 12 अरब क्यूबिक मीटर गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करती है।
इसके जरिए खाड़ी देशों से आने वाला तेल मलक्का जाने के बजाय सीधे म्यांमार के तट से पाइपलाइन के जरिए चीन पहुंच रहा है।
हिंद महासागर की बिसात और ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’
हिंद महासागर की इस बिसात पर चीन अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति को भी लगातार धार दे रहा है। मालदीव में बुनियादी ढांचे और फ्रेंडशिप ब्रिज जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए वह अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। वहीं, चागोस द्वीप समूह को लेकर चल रही अंतरराष्ट्रीय हलचल और मॉरीशस में चीनी निवेश ने वाशिंगटन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अमेरिका को डर है कि चीन इन निवेशों के जरिए डिएगो गार्सिया स्थित अमेरिकी सैन्य बेस की जासूसी कर सकता है।
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भारत की जवाबी घेराबंदी और म्यांमार का महत्व
जवाब में भारत ने भी ग्रेट निकोबार द्वीप पर नया एयरपोर्ट और मिलिट्री बेस बनाकर चीन की घेराबंदी तेज कर दी है, जो बंगाल की खाड़ी में एक प्राकृतिक अवरोध की तरह काम करेगा। इन सबके बीच म्यांमार चीन का ‘ट्रम्प कार्ड’ बना हुआ है। चीन वहां के आंतरिक संघर्षों में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अपने प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है, ताकि संकट के समय उसके पास हिंद महासागर का सीधा और सुरक्षित विकल्प मौजूद रहे।
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