सेवाएं ठप होने की चेतावनी
नई दिल्ली: आज यानी 31 दिसंबर को देशभर में फूड और ग्रॉसरी डिलीवरी सेवाएं बुरी तरह प्रभावित(Delivery Crisis) हो सकती हैं। ‘गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विसेज वर्कर्स यूनियन’ (GIPSWU) के नेतृत्व में लगभग 1 लाख डिलीवरी पार्टनर्स ने हड़ताल का आह्वान किया है। यूनियन का आरोप है कि जोमैटो, स्विगी और ब्लिंकिट जैसी कंपनियां उनका शोषण कर रही हैं। साल के आखिरी दिन होने वाली इस हड़ताल के कारण दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे मेट्रो शहरों में ऑनलाइन खाना या सामान मंगाना मुश्किल हो सकता है।
हड़ताल के पीछे के मुख्य कारण
डिलीवरी वर्कर्स की नाराजगी(Displeasure) की सबसे बड़ी वजह गिरती(Delivery Crisis) हुई कमाई और बढ़ता दबाव है। पहले प्रति ऑर्डर मिलने वाली ₹40-₹60 की राशि अब घटकर ₹15-₹25 रह गई है। इसके अलावा, 10-मिनट की इंस्टेंट डिलीवरी का बढ़ता दबाव सड़क दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ा रहा है। वर्कर्स सामाजिक सुरक्षा (पेंशन, बीमा) की कमी और बिना बताए आईडी ब्लॉक किए जाने जैसी मनमानी नीतियों के खिलाफ केंद्रीय श्रम मंत्री से दखल की मांग कर रहे हैं।
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बाजार और इकोनॉमी पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार, इस हड़ताल का सबसे ज्यादा असर फूड डिलीवरी और क्विक कॉमर्स ऐप्स पर पड़ेगा। दक्षिण भारत के बड़े शहरों में ऑर्डर(Delivery Crisis) की संख्या में 20% तक की गिरावट आ सकती है। हालांकि, ई-कॉमर्स कंपनियों (जैसे अमेज़न, फ्लिपकार्ट) का अपना लॉजिस्टिक नेटवर्क मजबूत होने के कारण उन पर असर कम होने की उम्मीद है। भले ही कंपनियों के कुल सालाना रेवेन्यू पर असर कम हो, लेकिन नए साल की पार्टियों के लिए ऑर्डर करने वाले ग्राहकों को आज भारी देरी या कैंसिलेशन का सामना करना पड़ सकता है।
‘गिग वर्कर्स’ किन्हें कहा जाता है और उन्हें क्या समस्या है?
गिग वर्कर्स वे लोग हैं जो ऐप-आधारित कंपनियों (जैसे जोमैटो, स्विगी, ओला) के लिए फ्रीलांस या कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर काम करते हैं। इनकी मुख्य समस्या यह है कि इन्हें कंपनी का ‘कर्मचारी’ नहीं बल्कि ‘पार्टनर’ माना जाता है, जिससे इन्हें पीएफ (PF), बीमा या पेंशन जैसे कानूनी लाभ और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती।
क्या इस हड़ताल का असर पूरे देश में एक समान होगा?
नहीं, इस हड़ताल(Delivery Crisis) का सबसे ज्यादा असर दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों के बड़े शहरों में देखने को मिलेगा। साथ ही, फूड डिलीवरी और 10-मिनट ग्रॉसरी ऐप्स ज्यादा प्रभावित होंगे, जबकि सामान्य ई-कॉमर्स डिलीवरी पर इसका असर काफी कम रहने का अनुमान है।
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