युद्ध के साये में पेट्रोल-डीजल और सोने की आसमान छूती कीमतें
नई दिल्ली: ईरान के विदेश मंत्री के अनुसार, फिलहाल होर्मुज जलमार्ग(Hormuz Crisis) को बंद करने का इरादा नहीं है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था(Global Economy) के लिए एक बड़ी राहत है। यह 167 किमी लंबा रास्ता दुनिया के 20% पेट्रोलियम व्यापार का केंद्र है। हालांकि, जलमार्ग खुला रहने के बावजूद ऑयल टैंकर्स पर हमलों का डर बना हुआ है। अगर यह तनाव बढ़ता है, तो शिपिंग और इंश्योरेंस लागत बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।
भारत पर असर: पेट्रोल-डीजल और महंगाई
भारत अपनी जरूरत का 90% तेल आयात करता है, जिसमें से आधा हिस्सा इसी रूट से आता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि कच्चे तेल(Hormuz Crisis) में उछाल आने पर दिल्ली सहित देश के अन्य हिस्सों में पेट्रोल ₹4-5 प्रति लीटर महंगा हो सकता है। हालांकि तेल कंपनियां कीमतें तय करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन अंतिम फैसला सरकार के टैक्स और रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) के उपयोग पर निर्भर करेगा ताकि आम जनता पर बोझ कम किया जा सके।
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सुरक्षित निवेश की ओर झुकाव और शेयर बाजार में हलचल
युद्ध की आहट से शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव की आशंका है। ऑटोमोबाइल और बैंकिंग सेक्टर पर सबसे ज्यादा दबाव दिखने की उम्मीद है। ऐसे अनिश्चित माहौल(Hormuz Crisis) में निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकालकर सोने और चांदी में लगा रहे हैं। कमोडिटी एक्सपर्ट्स के अनुसार, सोना ₹1.90 लाख प्रति 10 ग्राम और चांदी ₹3.50 लाख प्रति किलो तक पहुँच सकती है। संकट के समय ‘फिजिकल गोल्ड’ को सबसे भरोसेमंद संपत्ति माना जाता है।
होर्मुज जलमार्ग दुनिया के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
होर्मुज जलमार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के कुल पेट्रोलियम व्यापार का लगभग 20% हिस्सा इसी संकरे रास्ते से गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत और ईरान जैसे देश अपने तेल निर्यात के लिए इसी पर निर्भर हैं। भारत के भी 10% नॉन-ऑयल एक्सपोर्ट (जैसे चावल और मसाले) इसी रास्ते से जाते हैं।
यदि होर्मुज का रास्ता प्रभावित होता है, तो भारत के पास क्या विकल्प हैं?
भारत के पास अपने ‘स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व’ (SPR) हैं, जिनका उपयोग आपात स्थिति में किया जा सकता है। इसके अलावा, भारत खाड़ी देशों के विकल्प के रूप में अन्य देशों से तेल का आयात बढ़ा रहा है। साथ ही, सऊदी अरब की ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ जैसे वैकल्पिक रास्तों पर भी नजर रखी जा रही है।
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