Retail Inflation: रिटेल महंगाई में उछाल

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दिसंबर के आंकड़ों पर टिकी बाजार की नजर

नई दिल्ली: आज, 12 जनवरी 2026 को दिसंबर महीने के रिटेल महंगाई(Retail Inflation) के आंकड़े जारी किए जाएंगे। विशेषज्ञों(Experts) का मानना है कि इस बार खुदरा महंगाई 1.6% से 1.7% के बीच रह सकती है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो यह पिछले महीने यानी नवंबर की 0.71% की दर के मुकाबले एक बड़ी बढ़त होगी। हालांकि यह आंकड़ा अभी भी नियंत्रित श्रेणी में है, लेकिन लगातार दो महीनों से हो रही वृद्धि निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय हो सकती है

अक्टूबर का ऐतिहासिक निचला स्तर और बेस ईयर का महत्व

भारत में महंगाई(Retail Inflation) को मापने के लिए कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) का उपयोग किया जाता है, जिसका वर्तमान आधार वर्ष (Base Year) 2012 है। दिलचस्प बात यह है कि अक्टूबर 2025 में महंगाई दर 0.25% के साथ 14 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई थी, जिसका मुख्य कारण खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी गिरावट थी। सरकार समय-समय पर बेस ईयर को अपडेट करती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि महंगाई के आंकड़े वर्तमान उपभोग की आदतों और बाजार की वास्तविक कीमतों को सही ढंग से दर्शा सकें।

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महंगाई घटने-बढ़ने के पीछे का अर्थशास्त्र

महंगाई मुख्य रूप से डिमांड और सप्लाई के संतुलन पर निर्भर करती है। जब बाजार में लोगों के पास नकदी अधिक होती है, तो मांग बढ़ती है और आपूर्ति सीमित होने पर कीमतें ऊपर चढ़ जाती हैं। इसके विपरीत, यदि मांग कम हो और उत्पादन(Retail Inflation) या सप्लाई अधिक हो, तो कीमतें गिरने लगती हैं। दिसंबर में संभावित बढ़त के पीछे सर्दियों की फसलों की आवक और वैश्विक कारकों का असर हो सकता है। बेस ईयर (जैसे वर्तमान में 2012) की तुलना में वस्तुओं के औसत मूल्यों में आए बदलाव को ही प्रतिशत में महंगाई दर के रूप में दिखाया जाता है।

‘बेस ईयर’ क्या होता है और इसकी गणना कैसे की जाती है?

बेस ईयर वह संदर्भ वर्ष होता है जिसकी कीमतों को 100 मानकर आधार बनाया जाता है। वर्तमान में भारत में यह 2012 है। महंगाई(Retail Inflation) की गणना करने के लिए वर्तमान कीमतों की तुलना इसी आधार वर्ष की कीमतों से की जाती है। उदाहरण के लिए, यदि आधार वर्ष में कोई वस्तु ₹100 की थी और आज ₹102 की है, तो महंगाई 2% मानी जाएगी।

रिटेल महंगाई (CPI) का आम जनता पर क्या सीधा असर पड़ता है?

CPI सीधे तौर पर हमारी रोजमर्रा की चीजों जैसे दूध, सब्जी, अनाज और ईंधन की कीमतों से जुड़ी होती है। जब CPI बढ़ता है, तो आपकी क्रय शक्ति कम हो जाती है, यानी आप उतने ही पैसों में पहले के मुकाबले कम सामान खरीद पाते हैं। इसके अलावा, RBI भी ब्याज दरों (जैसे होम लोन की EMI) का निर्धारण इसी CPI के आंकड़ों को देखकर करता है।

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Dhanarekha

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