14 साल का टूटा रिकॉर्ड
नई दिल्ली: भारतीय रुपया(Rupee) शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ₹94.7 के सर्वकालिक निचले स्तर पर बंद हुआ। इस वित्त वर्ष (2025-26) में रुपए में 10% से अधिक की गिरावट आई है, जो 2011-12 के यूरो-ज़ोन संकट के बाद सबसे बड़ी गिरावट है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान-इजराइल युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और विदेशी निवेशकों द्वारा डॉलर की सुरक्षित निकासी (Capital Outflow) ने रुपए पर भारी दबाव बनाया है। यदि युद्ध लंबा चलता है, तो रुपया जल्द ही ₹98 प्रति डॉलर के स्तर को भी छू सकता है।
महंगाई और आम आदमी की जेब पर असर
रुपए(Rupee) के कमजोर होने का सीधा मतलब है कि भारत को विदेशों से सामान मंगाने के लिए अब ज्यादा पैसे खर्च करने होंगे। चूंकि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस (LPG) की कीमतों में बढ़ोतरी होना तय है। इसके अलावा, मोबाइल, लैपटॉप जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स सामान और विदेशों से आने वाला कच्चा माल भी महंगा हो जाएगा। मध्यम वर्ग के लिए विदेश में पढ़ाई और पर्यटन अब पहले के मुकाबले 10% से 15% तक महंगा हो सकता है।
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करेंसी डेप्रिसिएशन और RBI की भूमिका
किसी भी देश की मुद्रा की वैल्यू उसके विदेशी मुद्रा भंडार(Rupee) और अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मांग पर निर्भर करती है। जब भारत के पास डॉलर की कमी होती है या डॉलर की मांग बढ़ती है, तो रुपया कमजोर होने लगता है। इस स्थिति को ‘करेंसी डेप्रिसिएशन’ कहते हैं। आने वाले समय में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों (Interest Rates) में बढ़ोतरी कर सकता है, जिससे लोन और ईएमआई (EMI) महंगे होने की संभावना बढ़ गई है।
रुपए के गिरने से भारत में महंगाई क्यों बढ़ती है?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों (तेल और गैस) और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है। इनका भुगतान डॉलर में किया जाता है। जब रुपया गिरता है, तो हमें उसी सामान के लिए ज्यादा रुपए देने पड़ते हैं, जिससे देश के भीतर पेट्रोल, डीजल और अन्य आयातित वस्तुओं के दाम बढ़ जाते हैं।
क्या रुपया भविष्य में ₹98 तक जा सकता है?
विदेशी ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन और कई आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता रहा और कच्चे तेल की कीमतें $110-120 के पार गईं, तो रुपया अगले कुछ महीनों में ₹98 प्रति डॉलर के स्तर तक गिर सकता है।
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