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Wholesale Inflation: थोक महंगाई में उछाल

Dhanarekha
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Wholesale Inflation: थोक महंगाई में उछाल

आर्थिक स्थिरता पर नया दबाव

नई दिल्ली: दिसंबर 2025 के लिए जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत की थोक महंगाई दर (Wholesale Inflation) 0.83% पर पहुंच गई है। यह पिछले 8 महीनों का सबसे उच्चतम स्तर है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था में मूल्य वृद्धि के बदलते रुख को दर्शाता है। इससे पहले नवंबर में यह दर नकारात्मक (-0.32%) थी। इस उछाल का मुख्य कारण खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आई तेजी है, जिसने महंगाई को डिफ्लेशन(Deflation) से बाहर निकालकर पॉजिटिव जोन में ला खड़ा किया है

प्रमुख क्षेत्रों का विश्लेषण और वेटेज

थोक महंगाई(Wholesale Inflation) के तीन मुख्य हिस्सों में ‘मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स’ का वेटेज सबसे अधिक (64.23%) है, जिसमें महंगाई 1.33% से बढ़कर 1.82% हो गई है। इसका मतलब है कि फैक्ट्रियों में बनने वाले सामान की लागत बढ़ रही है। वहीं, ‘प्राइमरी आर्टिकल्स’ (दाल, गेहूं, सब्जियां) की महंगाई दर जो पहले माइनस 2.93% थी, अब बढ़कर 0.21% हो गई है। केवल ‘फ्यूल और पावर’ (ईंधन) सेक्टर में थोड़ी राहत है, जहाँ दर माइनस 2.31% रही, जिससे परिवहन लागत(Transportation Cost) पर नियंत्रण बना हुआ है।

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आम आदमी और खुदरा महंगाई पर असर

जब थोक बाजार(Wholesale Inflation) में कीमतें बढ़ती हैं, तो उसका सीधा असर कुछ समय बाद रिटेल यानी खुदरा बाजार (CPI) पर पड़ता है। दिसंबर में खुदरा महंगाई भी बढ़कर 1.33% हो गई है, जो तीन महीनों का हाई है। थोक महंगाई के लंबे समय तक बने रहने से कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल देती हैं, जिससे रोजमर्रा की वस्तुएं जैसे साबुन, प्लास्टिक, और मेटल से बने सामान महंगे होने लगते हैं। सरकार के पास इसे नियंत्रित करने के लिए केवल टैक्स और एक्साइज ड्यूटी में बदलाव का ही विकल्प बचता है।

थोक महंगाई (WPI) का आम आदमी की जेब पर क्या असर होता है?

थोक महंगाई(Wholesale Inflation) सीधे तौर पर आम आदमी को प्रभावित नहीं करती, लेकिन इसका ‘ट्रिकल-डाउन’ असर होता है। अगर WPI लगातार बढ़ती है, तो कंपनियों के लिए उत्पादन की लागत बढ़ जाती है। मुनाफा बनाए रखने के लिए वे अपने प्रोडक्ट्स (जैसे बिस्कुट, जूते, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण) के दाम बढ़ा देती हैं, जो अंततः खुदरा बाजार में आम ग्राहकों को महंगे मिलते हैं।

भारत में महंगाई को मापने के लिए WPI और CPI का उपयोग कैसे किया जाता है?

भारत में दो तरह से महंगाई मापी जाती है। WPI (होलसेल प्राइस इंडेक्स) उन कीमतों को ट्रैक करता है जो थोक व्यापारी आपस में लेनदेन में इस्तेमाल करते हैं; इसमें सेवाओं को शामिल नहीं किया जाता। वहीं, CPI (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स) आम ग्राहकों द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतों पर आधारित होता है, जिसमें भोजन, आवास और स्वास्थ्य जैसी सेवाओं का भी बड़ा हिस्सा होता है। RBI मुख्य रूप से ब्याज दरों को तय करने के लिए CPI (खुदरा महंगाई) को आधार बनाता है।

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