जब ट्रंप को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा
‘वॉशिंगटन: ट्रेड बाजूका’ दरअसल यूरोपीय(Europe) संघ का ‘एंटी-कोएर्शन इंस्ट्रूमेंट’ (Anti-Coercion Instrument) कानून है। यह कानून EU को यह शक्ति देता है कि यदि कोई देश उन पर या उनकी कंपनियों पर अनुचित आर्थिक दबाव डालता है, तो वे जवाबी कार्रवाई में उस देश के निवेश पर पाबंदी लगा सकते हैं, सरकारी टेंडर से बाहर कर सकते हैं और व्यापार पूरी तरह ठप कर सकते हैं। ट्रंप द्वारा 10% टैरिफ की धमकी के बाद, जब 27 यूरोपीय देशों ने मिलकर इस आर्थिक हथियार के इस्तेमाल की चेतावनी दी, तो ट्रंप को अपनी घोषणा वापस लेनी पड़ी।
चीन से मिली सीख और अमेरिका पर प्रयोग
यूरोप ने इस कानून की नींव 2021 में चीन के साथ हुए विवाद के बाद रखी थी। जब चीन ने लिथुआनिया के खिलाफ व्यापारिक प्रतिबंध लगाए, तब यूरोप(Europe) ने महसूस किया कि भविष्य में रूस या अमेरिका जैसी ताकतें भी ऐसा कर सकती हैं। ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जे की जिद और टैरिफ की धमकी ने यूरोप को एकजुट कर दिया। इस एकजुटता ने ट्रंप को यह संदेश दिया कि यूरोप अब अमेरिका के आगे झुकने या ‘गुलाम’ बनकर रहने को तैयार नहीं है।
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बदलती वैश्विक व्यवस्था और यूरोप की नई राह
दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने यूरोप(Europe) को यह सिखाया कि अब पुरानी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था खत्म हो चुकी है। अब बड़े देश व्यापार और सप्लाई चेन को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। बेल्जियम और पोलैंड जैसे देशों के कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया कि चाहे यूक्रेन को रूस के खिलाफ सैन्य मदद देनी हो या अमेरिका के टैरिफ का मुकाबला करना हो, यूरोप अब अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा। ट्रंप के फंड रोकने के बावजूद, यूरोप ने अकेले दम पर यूक्रेन के लिए 90 अरब यूरो की सहायता मंजूर कर अपनी मजबूती का परिचय दिया है।
‘एंटी-कोएर्शन इंस्ट्रूमेंट’ कानून की जरूरत यूरोप को क्यों पड़ी?
इस कानून की जरूरत इसलिए पड़ी ताकि कोई भी बड़ी शक्ति (जैसे चीन, रूस या अमेरिका) आर्थिक प्रतिबंधों या टैरिफ का डर दिखाकर यूरोपीय(Europe) देशों की राजनीतिक और संप्रभु फैसलों को प्रभावित न कर सके। यह यूरोप के 45 करोड़ लोगों के बाजार को एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
ग्रीनलैंड विवाद पर ट्रंप के रुख में बदलाव क्यों आया?
ट्रंप ने शुरुआत में ग्रीनलैंड को डेनमार्क से लेने के लिए कड़ा रुख अपनाया था, लेकिन यूरोपीय संघ और नाटो (NATO) की एकजुटता और ‘ट्रेड बाजूका’ की धमकी के बाद उन्हें एहसास हुआ कि इससे अमेरिका को अरबों डॉलर का व्यापारिक नुकसान हो सकता है। इसी आर्थिक खतरे के कारण उन्होंने ताकत के इस्तेमाल से इनकार कर दिया।
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