हिंद महासागर में चीन की नई ‘चाल’
बीजिंग: चीन अपनी तेल आपूर्ति और व्यापार(Business) के लिए मलक्का जलडमरूमध्य(Kra Canal) पर अत्यधिक निर्भर है, जिसे भारत युद्ध की स्थिति में आसानी से बंद कर सकता है। इस ‘मलक्का दुविधा’ से बचने के लिए चीन थाईलैंड के ‘क्रा इस्थमस’ में 120 किमी लंबी नहर बनाने की योजना पर काम कर रहा है। यह नहर दक्षिण चीन सागर को सीधे अंडमान सागर से जोड़ेगी, जिससे समुद्री रास्ता लगभग 1200 किमी छोटा हो जाएगा। इसे चीन की ‘समुद्री सिल्क रोड’ का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
भारत का सुरक्षा कवच: ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट
चीन(China) की गतिविधियों के जवाब में भारत ने ग्रेट निकोबार द्वीप पर ₹72,000 करोड़ की विशाल बुनियादी ढांचा परियोजना शुरू की है। इसके तहत एक रणनीतिक नौसैनिक बेस, अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह और हवाई अड्डा विकसित किया जा रहा है। चूंकि प्रस्तावित क्रा नहर भारत के इस प्रोजेक्ट के ठीक सामने खुलेगी, इसलिए भारतीय नौसेना के लिए चीन के नए समुद्री रास्ते पर निगरानी रखना और जरूरत पड़ने पर उसे नियंत्रित करना काफी आसान होगा।
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चीन की ‘कर्ज कूटनीति’ और संभावित चुनौतियां
विशेषज्ञों का मानना है कि क्रा नहर परियोजना थाईलैंड के लिए एक ‘सफेद हाथी’ साबित हो सकती है, जैसा कि श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह के साथ हुआ। 20 से 30 बिलियन डॉलर की भारी लागत और पर्यावरणीय चिंताओं के कारण यह प्रोजेक्ट अभी भी अधर में है। इसके अलावा, दक्षिणी थाईलैंड में राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा जोखिम भी बीजिंग की इस महत्वाकांक्षी योजना के सामने बड़ी बाधाएं खड़ी कर रहे हैं।
चीन ‘क्रा नहर’ परियोजना को इतनी प्राथमिकता क्यों दे रहा है?
चीन को डर है कि युद्ध जैसी स्थिति में भारत मलक्का जलडमरूमध्य को बंद कर उसकी समुद्री सप्लाई लाइन काट सकता है। क्रा नहर उसे हिंद महासागर तक पहुंचने के लिए एक वैकल्पिक और छोटा रास्ता प्रदान करेगी, जिससे उसकी मलक्का पर निर्भरता खत्म हो जाएगी।
ग्रेट निकोबार परियोजना भारत के लिए रणनीतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
यह परियोजना हिंद महासागर के मुहाने पर स्थित है, जहाँ से दुनिया का अधिकांश समुद्री व्यापार गुजरता है। यहाँ नेवल बेस और ट्रांसशिपमेंट पोर्ट बनाकर भारत अपनी समुद्री सुरक्षा को मजबूत कर सकता है और चीन की विस्तारवादी गतिविधियों पर प्रभावी ढंग से लगाम लगा सकता है।